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Monday, 14 August 2017


जिस देश की धरती शस्य-श्यामला
हृदय बहे गंग रसधार
जिसके सिर पर मुकुट हिमालय
सागर रहा है पैर पखार
स्वर्ग बसा जिसकी धरा पर
सुरासुर करते जिसका यश गान
जिस धरा पर पाकर जन्म हुए
आर्यभट्ट चाणक्य महान
उस देश को न झुकने देंगे
उस देश को न मिटने देंगे
प्रणों की आहुति भी देंगे
बचाने को इसका सम्मान
मालती मिश्रा

Sunday, 13 August 2017

गरिमामयी पद के गरिमाहीन पदाधिकारी

 देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर आसीन पदाधिकारी उप-राष्ट्रपति मो० हामिद अंसारी ने पद छोड़ते समय जो कुछ भी कहा नि:संदेह उससे राष्टृवादी लोगों के हृदय को ठेस लगी होगी। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिर ऐसा बयान दिया जो उनके पद की गरिमा को धूमिल करता है। उनके कथनानुसार हमारे देश में आज अल्पसंख्यक असुरक्षित है। पिछले दस वर्षों से इस पद पर बने रहने के बावजूद कई बार विवादित बयान देने के बावजूद, देश के राष्ट्रध्वज को सम्मान न देने के बावजूद वह आज तक उसी पद पर उतना ही सम्मान पाते रहे हैं फिर भी उन्हें अल्पसंख्यक यानी अपने धर्म के लोग डरे हुए नजर आ रहे हैं। कमाल की बात तो यह है कि वह अल्पसंख्यक सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोगों को ही मानते हैं, जैन, पारसी, ईसाई आदि उन्हें अल्पसंख्यक नहीं लगते। उनकी दृष्टि में देश में इतनी असहिष्णुता थी फिर भी वह अपने पद अपने अधिकारों के मोह का त्याग नहीं कर पाए, यदि वास्तव में उन्हें अपने समुदाय के लोग डरे सहमें नजर आ रहे थे और वह पदासीन रहते हुए कुछ नहीं कर सकते थे तो क्यों नहीं अपने पद से त्यागपत्र दे कर अपनी आवाज उठाई? पर उनका अब ऐसा बयान देना एक अलग ही खेल दर्शाता है। अब वह समुदाय विशेष को डराकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। जिस देश में रहते हैं, जिस देश का नमक खाते हैं और पूरी सुरक्षा और सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं उसी देश के राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान को सम्मान नहीं देते फिर भी वही देश इन्हें सिर आँखों पर बिठाता है; फिर भी इनका अस्तित्व खतरे में है! फिर भी देश में असहिष्णुता है!!
क्या ऐसे बोल बोल कर ये स्वयं देश के लोगों में एक समुदाय विशेष के लिए जहर नहीं घोल रहे? जो लोग आपस में जाति-धर्म को भूल कर भाईचारे की भावना से रहते हैं उनमें ये परस्पर भेदभाव और असुरक्षा की भावना को जन्म दे रहे हैं।
समझ नहीं आता कि ऐसी विचारधारा के व्यक्ति को ऐसे उज्ज्वल पद पर क्या सिर्फ पद की गरिमा को धूमिल करने के लिए बैठाया गया या फिर यह कहूँ कि इन्हें भी सिर्फ पूर्वजों के नाम उनके कार्यों का सहारा मिला और इन्होंने भी नेहरू परिवार की तरह सिर्फ पूर्वजों के नाम के सहारे देशहित की आड़ में सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध किया। आज सिर्फ एक ही प्रश्न बार-बार समक्ष होता है कि कब तक पूर्वजों के स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग देने के नाम पर ये वंशज देश को खोखला करते रहेंगे और हम इमोशनल फ़ूल बनते रहेंगे। किस शास्त्र में लिखा है कि यदि दादा-परदादा देशभक्त हों तो पोते-परपोते देशद्रोही नहीं हो सकते?
आखिर कब तक यह देश गरिमामयी पदों के गरिमाहीन पदाधिकारियों के बोझ तले दबा रहेगा?  कब तक??
मालती मिश्रा

Saturday, 12 August 2017

बहुत याद आता है गुजरा जमाना

बहुत याद आता है गुजरा जमाना

वो अल्हड़ औ नटखट सी बचपन की सखियाँ
वो गुड्डा और गुड़िया की शादी की बतियाँ
वो पलभर में झगड़ना रूठना और मनाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.......

वो गाँव की चौड़ी कहीं सँकरी सी गलियाँ 
वो गलियों में छिप-छिप के सबको चिढ़ाना
वो दादा जी का छड़ी दिखाकर डराना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना....

वो मन भाती दुल्हन की बजती पायलिया
वो शर्माती आँखों को ढँकती चुनरिया
वो देखने को उसको बहाने बनाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना....

वो बाबा की लाठी को चुपके से उठाना
दिखा करके उनको वो दूर से चिढ़ाना 
वो उनके झूठे गुस्से पर तालियाँ बजाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.....

वो खेतों-खलिहानों की मीठी सी यादें
वो गन्ने की ढेरी पर जागी सी रातें
वो मस्ती में कोल्हू के बैलों संग चलते जाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.....

वो ओस में भीगी खेतों की हरियाली
वो बेमौसम बारिश कराती सी डाली
वो कोहरे की चादर में खेतों का छिप जाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना........

वो पनघट पर हँसती चहकती सी गोरी
वो नदिया की कल-कल ज्यों गाती सी लोरी
वो पानी में कागज की नावों का चलाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना........

वो बारिश के पानी में मेढक की टर-टर
वो खेतों से आती सी झींगुर की झर-झर
वो बारिश में हरियाली का नहाकर निखर जाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.....

वो बारिश के पानी का घुटनों तक भर आना
पानी में उतर कर तैराकी दिखाना
वो अल्हड़ से बचपन का उसमें नहाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.......

मालती मिश्रा

Wednesday, 2 August 2017

आशा की किरन


इक आशा की किरण पाने को
अंधकार में भटक रही है,
आँखों में उदासी के बादल
मसि बन अश्रु बिखर रही है।

शब्द-शब्द में पीर बह रही 
खामोशियाँ चीत्कार कर रहीं 
पीड़ा किसी को दिखा न सके जो 
वो शब्दों में हाहाकार कर रही।

जुबाँ खामोशी की चादर ओढ़े
अधरों पर निःशब्दता का पहरा
आँखों का असफल प्रयास भी
पलकों तक आकर ठहरा।

अनकहे अनसुने शब्दों में
हाहाकार सुनाई देता,
शांत नयन में झिलमिल करते
अपरिमित व्याकुलता देखा।

सूना दर्पण जीवन का
हर गुजरे पड़ाव बताता है,
कोरे कागज का रीतापन
अकथ्य कथा सुनाता है।

अधर सकुचाने लगे जब 
ज़ज़्बात घबराने लगे,
हिय की सब आकुलता 
तब नयन बतलाने लगे।

मुस्कुराते अधरों के पीछे
उदासी की बदली घिर आई
चहकती खनकती सी हँसी में
मन की चीख पड़ती है सुनाई।

मालती मिश्रा

Sunday, 30 July 2017

अस्तित्व

शय्या पर पड़ी शिथिल हुई काया
जो सबको है भूल चुकी,
अपनों के बीच अनजान बनी
अपनी पहचान भी भूल चुकी।
तैर रही कोई चाह थी फिरभी
बेबस वीरान सी आँखों में,
लगता जीवन डोर जुड़ी हो
खामोश पुकार थी टूटती सांसों में।
ढूँढ रहीं थीं कोई अपना
लगे कोई जाना-पहचाना,
हर एक चेहरे को किताब मान
पढ़ने को दिल में था ठाना।
अंजाने से चेहरों में थी 
तलाश किसी अपने की,
मानो अब भी बची हुई थी 
इक आस किसी सपने की।
तभी किन्हीं अनसुने कदमों की 
आहट से भाव बदलते देखा,
मुरझाए मृतप्राय हो चुके
चेहरे पर उमंग खिलते देखा।
देख नहीं पाई थीं जो
सचेत सजग जागती इंद्रियाँ,
सुप्तप्राय इंद्रियों को उस
आगंतुक की राह तकते देखा।
चमक उठीं वीरान सी आँखें
अधरों में कंपन थिरक उठा,
अंजाने हो चुके चेहरों में
बेटी का चेहरा जब मुखर हुआ।
टूट गया बाँध सब्र का
अश्रुधार बस बह निकली,
क्षीण हो चुकी काया की बेबसी
बिन बोले सब कह निकली।
माँ की अनकही अनसुनी बेबसी
बेटी के हृदय को चीर गए,
उसकी आँखों में तैर गई बेबसी
कैसे वह माँ का पीर हरे।
जो ईश हमारी सदा रही
जो सदा रही है सर्वश्रेष्ठा,
व्याधियों के वशीभूत हो
उसकी काया हुई परहस्तगता।
पुत्री उसे कैसे देखे अशक्त
जो उसमें भरती थी शक्ति सदा,
जिसने किया मार्ग प्रशस्त सदा
जिससे उसका अस्तित्व रहा।
बन ज्योति जीवन में दमकती जो रही
बन मुस्कान अधरों पर थिरकती जो रही,
वह निर्मम व्याधियों के शिकंजे में फँसी
निरीह निर्बल अशक्त हुई।
गर रही न कल ममता उसकी
अस्तित्व मेरा भी खत्म अहो,
डोर जुड़ी जिससे है मेरी
वह बाँधूँगी फिर किस ठौर कहो।।
मालती मिश्रा

Thursday, 27 July 2017

एकाधिकार

आज एक बेटी कर्तव्यों से मुख मोड़ आई है
दर्द में तड़पती माँ को बेबस छोड़ आई है।
बेटी है बेटी की माँ भी है माँ का दर्द जानती है
माँ के प्रति अपने कर्तव्यों को भी खूब मानती है
बेटों के अधिकारों के समक्ष खुद को लाचार पाई है
दर्द में तड़पती माँ को बेबस छोड़ आई है।

अपनी हर संतान पर माँ का स्नेह बराबर होता है
पर फिर भी बेटों का मात-पिता पर एकाधिकार होता है
जिसको अपने हिस्से का निवाला खिलाया होता है
उसके ही अस्तित्व को जग में पराया बनाया होता है
कब बेटी ने स्वयं कहा कि वह पराई है
दर्द में तड़पती माँ को बेबस छोड़ आई है।
मालती मिश्रा

Thursday, 6 July 2017


एक लंबे अंतहीन सम इंतजार के बाद 
आखिर संध्या का हुआ पदार्पण
सकल दिवा के सफर से थककर
दूर क्षितिज के अंक समाने
मार्तण्ड शयन को उद्धत होता
अवनी की गोद में मस्तक रख कर
अपने सफर के प्रकाश को समेटे
तरंगिनी में घोल दिया
प्रात के अरुण की लाली से जैसे
संध्या की लाली का मेल किया
धीरे-धीरे पग धरती धरती पर
यामिनी का आगमन हुआ
जाती हुई प्रिय सखी संध्या से
चंद पलों का मिलन हुआ
तिमिर गहराने लगा
निशि आँचल लहराने लगा
अब तक अवनी का श्रृंगार 
दिनकर के प्रकाश से था
अब कलानिधि कला दिखलाने लगा
निशि के स्याम रंग आँचल में
जगमग तारक टाँक दिया
काले लहराते केशों में 
चंद्र स्वयं ही दमक उठा
अवनी का आँचल रहे न रिक्त
ये सोच जुगनू बिखेर दिया
टिमटिमाते जगमगाते तारक जुगनू से
धरती-अंबर सब सजा दिया
कर श्रृंगार निशि हुई पुलकित
पर अर्थहीन यह सौंदर्य हुआ
मिलन की चाह प्रातः दिनकर से
उसका यह स्वप्न व्यर्थ हुआ।
मालती मिश्रा