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Wednesday, 30 December 2015

खामोशी



तुम हो मैं हूँ और हमारे बीच है...गहरी खामोशी
खामोशी..
जो बोलती है
पर तुम सुन नहीं पाते
खामोशी जो शिकवा करती है 
तुमसे तुम्हारी बेरुखी की
पर तुम अंजान बन जाते हो 
खामोशी..
जो रोती है, बिलखती है 
पर तुम देख नहीं पाते 
खामोशी...
जो माँगती है इक मुस्कान 
पर तुम अनभिज्ञ अंजान
न पाए इसकी सूनी आँखों को पहचान 
खामोशी...
जो हँसती है अपनी बेबसी पर 
पर ठहाकों में छिपा दर्द तुम्हें छू न सका
खामोशी...
जो चीखती है, चिल्लाती है 
अपना संताप बताती है 
पर तुम हो बेखबर 
खामोशी..
जो खोजती है तुम्हारी नजरों को 
खामोशी...
जो सुनती है तुम्हारी सांसों की धुन को
खामोशी....
जो पढ़ती है तुम्हारी आँखों को 
खामोशी....
जो कहती है, सुनती है, 
देखती,पढ़ती और समझती है
पर कुछ भी बताने में झिझकती है...
वही खामोशी..
फैली है आज चारों ओर
जिसका कोई ओर न छोर 

साभार...मालती मिश्रा

Tuesday, 29 December 2015

तन्हाई.....


तन्हाई की गहराई तक
पाया खुद को तन्हा मैंने...
चलोगे तुम साथ मेरे
थाम हाथों में हाथ मेरे...
देखा था ये सपना मैंने|
पर सपना था वो....सिर्फ सपना
होता है ये कब किसी का अपना?
कुछ पल का जीवन दे जाता है 
अकेलेपन से दामन छुड़ा जाता है 
पर जब टूटता है.....
तो तन्हाई की इन्तहाँ तक 
अकेलेपन के अथाह सागर में 
डूबने के लिए....
अकेला छोड़ जाता है 
तन्हाई की गहराई में 
फिर......
पाया खुद को तन्हा मैंने...

साभार....मालती मिश्रा

Sunday, 20 December 2015

बढ़ती सुविधाएँ.....घटते संस्कार


आज दुनिया ने विकास के नये-नये आयाम हासिल कर लिए हैं मनुष्य ने अपनी बुद्धि, अपनी सूझ-बूझ से विकास की ऊँचाइयों को छू लिया है, मनुष्य ने तकनीकी विकास के द्वारा सुख-सुविधाओं के उन साधनों का आविष्कार किया है जिनके विषय में पहले व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था, आज व्यक्ति विकास की उस ऊँचाई पर है जहाँ पर पहुँचने की कल्पना भी पहले का मानव नहीं कर सकता था....हालांकि आविष्कार का आरंभ तो 'आग' के आविष्कार के साथ ही प्रारंभ हो चुका था किंतु यह आविष्कार मनुष्य को इतना आगे ले आएगी ये किसी ने सोचा भी न होगा....

जो दूरी व्यक्ति पहले महीनों में पैदल चलकर तय करता था आज वही दूरी चंद घंटों मे तय कर लेता है, पहले व्यक्ति अपने करीबी लोगों को समाचार प्रेषित करने के लिए पक्षियों का फिर राहगीरों का और फिर डाक का सहारा लेने लगा, इन सभी तरीकों में समय अधिक लगता था परंतु अब मोबाइल के आविष्कार ने न सिर्फ यह समस्या हल कर दिया बल्कि क्षण भर में ही समाचार प्राप्त होने के साथ-साथ वीडियो कॉल के जरिए व्यक्ति विशेष से आमने-सामने बात भी हो जाती है...किंतु इन तकनीकी साधनों के द्वारा जहाँ दूरियाँ घटी हैं वहीं व्यक्ति के दिलों में दूरियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि उन्हें तय कर पाना लगभग असंभव होता जा रहा है...जहाँ एक स्थान से दूसरे स्थान, एक शहर से दूसरे शहर और एक देश से दूसरे देश तक जाने आने में बहुत कम समय लगता है वहीं अब एक ही घर में रह रहे व्यक्तियों के पास भी एक-दूसरे से बात करने का भी समय नहीं होता, दो-चार कदम की दूरी पर रह रहे अपने रिश्तेदारों,मित्रों से भी महीनों नही मिल पाते.....जबकि इन तकनीकी सुविधाओं के आविष्कार से पहले व्यक्ति दूर होते हुए भी दिल के इतने करीब होते थे कि मिलने का समय निकाल ही लेते थे चाहे फिर कोसों दूर पैदल चलकर जाना पड़ता था, दूर रहने वाले रिश्तेदारों के बारे में समाचार पूछने हेतु दूर-दूर तक चले जाया करते थे |

आज के समय में तकनीकी साधनों ने स्थानों की दूरियाँ जितनी कम की हैं दिलों की दूरियाँ उससे अधिक बढ़ा दी हैं, रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है, संस्कारों के मापदंड बदलने लगे हैं, स्वार्थांधता लोगों पर हावी होती जा रही है,रिश्तों को देखने का नजरिया बदलने लगा है,उनके प्रति सम्मान तथा जिम्मेदारी का भाव समाप्त हो रहा है| 

माता-पिता बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर मोबाइल दिलवाते हैं ताकि जब बच्चा घर से बाहर हो तो वह उनके संपर्क में रहे किंतु बच्चों ने मोबाइल को ही अपना सब कुछ बना लिया है, वह घर से बाहर रहकर तो माता-पिता के संपर्क में रहते हैं किंतु घर पर आने के बाद माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्यों से उनका संपर्क लगभग टूट-सा जाता है... अलग-थलग कमरे में बैठकर सोशल साइट्स पर अनजाने मित्रों से चैटिंग करते हैं किंतु घर के ही दूसरे कमरे में माता-पिता को उनकी जरूरत होगी इस बात का अहसास भी नहीं होता....फेसबुक पर अनजाने मित्रों की फोटो देखकर उसपर कमेंट देना कभी नहीं भूलते परंतु माँ ने प्यार से पकाकर जो खिलाया उसके विषय में कुछ कहना चाहिए ये पता ही नहीं होता....देर रात तक मोबाइल पर गेम खेलने, चैटिंग करने के लिए जागते है परंतु बहन या छोटे भाई की पढ़ाई में एक घंटे की मदद देने को तैयार नहीं....आजकल की नई पीढ़ी फेसबुक पर बुजुर्गों की तस्वीरें देखकर उनपर दया दर्शाते तथा बड़े बुजुर्ग की सेवा व सम्मान पर कमेंट तो करते हैं पर अपने माता-पिता व दादा-दादी के लिए सोचने का समय भी उनके पास नहीं होता..
मदर्स-डे पर बड़े-बड़े आदर्शों की बातें करके ही वो माँ के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर लेते हैं....बढ़ते तकनीकी ज्ञान ने आज की पीढ़ी में निःसंदेह ज्ञान का सर्जन किया है, समय की बचत किया है, कार्यों को आसान किया है, इसने देशों के बीच की दूरी को समाप्त करके दुनिया को एक साथ जोड़ने का भी कार्य किया है किंतु इतने सारे महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणामों के बाद एक नकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगा है वो है रिश्तों के बीच दूरी, आपसी जुड़ाव का अभाव, भावनाओं की समाप्ति, आदर्शों का क्षय, जिम्मेदारी के अहसास की समाप्ति, कुल मिलाकर तकनीकी ज्ञान और तकनीकी सुविधाएँ हमें सभ्य तो बना रही हैं किंतु संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं और संस्कार विहीन समाज सम्पन्न और प्रसन्न दिखाई तो पड़ता है परंतु प्रसन्न होता नहीं...अपने मूल्यों से जुदा होकर कभी कोई प्रसन्न नहीं होता.....

साभार......मालती मिश्रा

Monday, 14 December 2015

मैं फेल हो गई......एक सोच


बैठे-बैठे यूँ ही मेरे मन में 
आज अचानक ये विचार आए 
अपने जीवन के पन्नों को 
क्यों न फिर से पढ़ा जाए 
अतीत में छिपी यादों की परत पर 
पड़ी धूल जो हटाने लगी 
अपने जीवन के पन्नों को 
एक-एक कर पलटने लगी 
जब मैं छोटी सी गुड़िया थी
माँ की आँखों का तारा  थी
बाबा की राजदुलारी थी
उनको जान से प्यारी थी 
माँ के सारे अरमान थी मैं 
बाबा का अभिमान थी मैं 
संकुचित विचारों के उस छोटे गाँव में 
लोगों की सोच भी छोटी थी 
शिक्षा पर बेटों का हक था
बेटियाँ अशिक्षित ही होती थीं
संकुचित विचारधारा को तोड़कर 
बाबा ने मुझे पढ़ाया था 
बाबा का मान बढ़ाऊँगी
मैंने ये स्वप्न सजाया था 
अकस्मात् जीवन में मेरे 
नया एक आयाम आया 
माँ-बाबा से इतर मेरे जीवन में
किसी और ने भी अपना स्थान बनाया 
जीवन की प्राथमिकता बदली 
स्वार्थ का बीज अंकुरित हो गया
माँ-बाबा के सम्मान से बढ़कर
अपनी खुशियों का नशा चढ़ गया 
माँ-बाबा का मान बढ़ाने का 
उनके स्वप्न सजाने का 
ख्याल न जाने कहाँ खो गया 
लक्ष्य कुछ करके दिखाने का
अपने गाँव की तंग सोच को
विकास के पंख लगाने का
वो ख्वाब न जाने कहाँ सो गया 
नियति अपना खेल खेल गई
उस दिन ये बेटी फेल हो गई....
माँ-बाबा मैं फेल हो गई....
भाई-बहन का रिश्ता प्यारा था
इस जग से अलग वो न्यारा था
उनका तो विश्वास थी
सबसे अलग कुछ खास थी
उनके विश्वास से भी खेल गई
एक बहन फेल हो गई....
रूखा-सूखा खाकर भी
सम्मान को सदा ऊँचा रखना
कैसा भी संकट आए
स्वाभिमान नहीं जाने देना
बाबा से यही सीखा था मैंने 
बाबा को आदर्श मान
पति में उन्हीं गुणों को तलाशा
गुण तो मिले न एक भी
उम्मीदें टूटीं मिली निराशा 
हालातों से समझौता करना 
यही एक विकल्प बचा 
करके समझौता हालातों से 
निराशा को भी गई पचा 
पर सहा न गया मुझसे आघात 
स्वाभिमान को खंडित करके 
छलनी किए मेरे जज्बात 
पति-पत्नी में विश्वास रहा न
ये रिश्ता मैं न झेल पाई
एक पत्नी मुझमें फेल हुई 
मेरे बच्चे मेरी जान
जिनपर करती मैं अभिमान
लुटा दिया उनपर सारा जहान
उनको लेकर हर पल मेरे
सपने भरते रहे उड़ान 
आज वो बच्चे बड़े हो गए
अपनी दुनिया में ही खो गए
मेरे आदर्श मेरे उसूल
उनको लगने लगे फिजूल 
अपनी परछाईं में मैं 
अपनी छवि न समा पाई 
स्वाभिमान की शय्या पर 
मेरे आदर्शों की मृत्यु हुई
एक माँ भी देखो फेल हुई.....
हाँ कहने में भले ही देर हुई 
पर सच है...
हर रिश्ते में मैं फेल हुई.....

साभार.....मालती मिश्रा

Friday, 11 December 2015

मुखौटा...


आँखें नम हैं, दिल में गम है 
छिपाए फिरते हैं दुनिया से 
चिपका कर होंठों पे झूठी मुस्कान 
दिल में लिए फिरते हैं दर्द का तूफान 
पहन मुखौटा मान-सम्मान का
करते सुरक्षा झूठे अभिमान का
भीतर से टूटे-बिखरे पड़े हैं
फिर भी प्रत्यक्ष में अकड़े खड़े हैं
डर है निर्बलता मेरी जाने न कोई
मेरे अंतस के भय को पहचाने न कोई
देखकर लोगों हरपल ठहाके लगाते
न जाना पाई कभी वो भी हैं आँसू छिपाते 
दर्द का सौदा ही मुझको करना पड़ा है
खुशियों का भाव अाजकल आसमान पे चढ़ा है..

साभार....मालती मिश्रा

Friday, 4 December 2015

बाबूजी ने सुनाई कहानी-'एक तो देखी घर की नार'


   सभा समाप्त हुई, राजा साहब लुटेरों को ढूँढ़ने का आदेश देकर दरबार से प्रस्थान कर चुके थे, सभी मंत्रियों, दरबारियों में बुदबुदाहट शुरू हो गई थी..
कोई कह रहा था कि जरूर कोई भीतर का ही होगा अन्यथा इतनी बड़ी चोरी को अन्जाम देना असंभव है तो दूसरा कहता नही इतना साहस किसी में नहीं कि वो इस कदर विश्वासघात करे, जरूर कोई शातिर अनुभवी लुटेरा होगा......
माधव ये सब बड़े ध्यान से सुन रहा था वो दरबार में सभा शुरू होने से पहले ही आ गया था, वो समय पर पहुँचकर यहाँ के राजा को एक महत्वपूर्ण सूचना देना चाहता था...सभा शुरू हुई..महामंत्री ने राजा को नगर में हुई बहुत बड़ी चोरी की सूचना दी, सभी इस समस्या पर विचार-विमर्श करते रहे...एक कोने में खड़ा माधव इस इंतजार में था कि कोई उससे पूछे तो वो सब सच्चाई बताकर चोर को पकड़वाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे...परंतु उससे कुछ पूछना तो दूर किसी ने उसकी ओर देखा तक नहीं| जब सभा समाप्ति की घोषणा करके राजा चले गए तो मायूस हेकर माधव बड़बड़ाते हुए जाने लगा......
इक तो देखी घर की नारी,
थूक-फज़ीहत लातन से मारी,
दूजा देखा फुक्कन वीर
गठरी ले गयो नदी के तीर,
तीजा देखा जटाधारी,
लूट शहर आसन-धारी,
चौथा देखा राज-दरबार,
कोई न पूछे बात हमार |
स्वयं से ही बुदबुदाते हुए माधव राज दरबार से बाहर की ओर जाने लगा....किंतु उसकी बातें किसी मंत्री के कानों को सचेत कर चुकी थीं, उस मंत्री की कठोर आवाज आई....रुको, माधव के पैर ज्यों के त्यों रुक गए....कौन हो तुम? पहले कभी तो नही देखा, कहाँ से आए हो?
मंत्री ने एक साथ कई प्रश्न पूछ डाले, उसके स्वयं के चेहरे पर भी कई सवालिया निशान साफ दृष्टिगोचर हो रहे थे|
साहब जी मैं माधव हूँ, यहाँ से बहुत दूर एक छोटे से गाँव टीकमपुरा से आया हूँ |
तुम अभी क्या बोल रहे थे? मंत्री ने पूछा
साहब मैं कह रहा था- इक तो देखी........
माधव ने वही लाइनें ज्यों की त्यों दुहरा दीं
म्मैं समझा नहीं तुम्हारी इस पहेली का मतलब, सीधे-सीधे समझाओ नहीं तो कैद कर लिए जाओगे....मंत्री ने धमकाते हुए कहा
माधव बोला- मंत्री जी मेरी इस पहेली को समझने के लिए आपको मेरी पूरी आपबीती सुननी पड़ेगी |
क्या ये आवश्यक है? मंत्री बोला
मेरे लिए न सही परंतु आपके लिए आवश्यक है...माधव ने जवाब दिया
वो कैसे? मंत्री ने पूछा
वो तो पूरी बात सुनकर ही जान पाएँगे...माधव ने कहा
ठीक है सुनाओ...कहकर मंत्री कुछ अन्य मंत्रियों के साथ वहीं दरबार में बैठ गया, माधव ने बताना शुरू किया......

शाम का समय था दिन भर के अनवरत सफर से थककर सूर्य देव भी विश्राम हेतु अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर चुके थे, रात अपना स्याह आँचल धीरे-धीरे फैलाने लगी थी,तेजी से उड़ते पंछियों के झुंड अपने-अपने नीड़ की ओर पहुँचने की जल्दी में प्रतीत हो रहे थे किंतु सुबह का निकला माधव अबतक घर वापस नही आया, कमली हल्की सी आहट पाकर दरवाजे की ओर देखती किंतु माधव को न पाकर निराश हो जाती, कमली पानी पिला दो,बहुत प्यास लगी है...अचानक माधव की आवाज सुनकर कमली पीछे मुड़ी....माधव बाहर पड़ी खाट पर बैठते हुए बोला|
बड़े थके हुए लग रहे हो लगता है कई दिनों की मजदूरी एक ही दिन में कर आए हो...पानी का लोटा माधव की ओर बढ़ाते हुए कमली ने कहा,
कहाँ पगली, सुबह से सिर्फ ये दो जून की रोटी का इंतजाम हुआ है....कहते हुए माधव ने अनाज की छोटी सी पोटली अपनी पत्नी की ओर बढ़ा दी,
खुशी से दमकते कमली के चेहरे पर एकाएक उदासी के बादल घिर आए जिसे माधव ने भी महसूस किया...
कमली, मैं सोच रहा हूँ मैं कुछ दिनों के लिए शहर चला जाऊँ, कुछ पैसे कमा लूँगा फिर यहाँ आकर छोटा-मोटा धंधा शुरू कर दूँगा...माधव ने कहा
पर जाओगे कैसे, हमारे पास तो थोड़ा-बहुत भी कुछ नहीं है राह में क्या खाओगे? कमली ने कहा,
तुम चिंता न करो मैं इंतजाम कर लूँगा...माधव बोला
सुबह होते ही माधव शहर जाने के लिए तैयार होने लगा, पड़ोस में रह रहे भाई से कुछ रूपए उधार ले आया, उनमें से कुछ कमली को दे दए और बचे हुए रूपए स्वयं के लिए रख लिए... कमली ने उसके कपड़े एक पोटली मे बाँध दिए और रास्ते में खाने के लिए रोटी-अचार,कुछ चबैना पोटली में रख दिया और उदास होकर माधव से बोली-तुम्हारे जाने के बाद मैं कैसे रहूँगी? 
मैं जल्द ही वापस आ जाऊँगा, बस एक-दो महीने की बात है तब तक भइया और उनका परिवार है न वो तुम्हें कोई परेशानी न होने देंगे...कह कर माधव ने विदा ली|

चलते-चलते एक प्रहर बीत गया माधव भी थक गया था, वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर आराम करने लगा, उसकी सोच ने करवट बदली मेरी पत्नी क्या कर रही होगी, बेचारी कितनी उदास होगी कोई आश्चर्य नहीं कि वो रो रही हो...हे भगवान ये मैंने क्या कर दिया, इतना प्रेम करने वाली अपनी पत्नी को अकेली छोड़कर आ गया....वो तो मेरे बगैर खाना भी नही खाएगी, यदि ऐसा हुआ तो बीमार पड़ जाएगी, नहीं-नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूँगा मैं उसे भी साथ ले जाऊँगा....सोचते हुए माधव जल्दी से उठा और वापस गाँव की ओर चल दिया | कमली मुझे देखकर कितनी खुश होगी और जब मैं उसे साथ ले जाने की बात बताऊँगा तब तो खुशी से पागल ही हो जाएगी...सोचते हुए माधव के पैर दोगुना तेजी से घर की ओर बढ़ रहे थे....घर पहुँचते-पहुँचते दो प्रहर बीत चुके थे,घर के भीतर जाने से पूर्व माधव के मन में जिज्ञासा हुई ये जानने की कि कमली क्या कर रही है? उसने खिड़की के पट को हल्के से सरकाया और दरार में से झाँका तो वो स्तब्ध रह गया.... कमली उसकी फोटो के टुकड़े-टुकड़े कर रही थी फिर उन टुकड़ों पर उसने थूक दिया और लात से मारते हुए बोली-तुझे याद करे मेरी जूती, जब से इस घर में आई हूँ तूने सिवाय कंगाली के दिया ही क्या है? अब मैं अपने माँ-बाप के घर आराम से रहूँगी....तेरे रहते तो वहाँ भी नहीं रह सकती थी | 
माधव का हृदय छलनी-छलनी हो गया....वो दबे कदमों से वापस मुड़ा और फिर चल दिया शहर की ओर....किंतु इस बार मन में उत्साह नहीं था कुछ कर गुजरने का जुनून नहीं था.....निराशा और हताशा उसकी चाल में साफ दिखाई दे रही थी |

चलते-चलते शाम हो गई, सूर्यास्त हो रहा था, अँधेरा अपना दामन पसारने लगा था...माधव को शौच जाने की आवश्यकता महसूस हुई. वो इधर-उधर देखने लगा...पास ही नदी बह रही थी, दूर-दूर तक खेत नजर आ रहे थे...शाम के धुंधलके में एक साया माधव को अपनी ओर आता हुआ प्रतीत हो रहा था, धीरे-धीरे वो साया करीब आ गया....वो माधव की ही तरह एक राही था | दोनों ने एक-दूसरे का परिचय प्राप्त किया..उसने माधव को अपना नाम फुक्कन वीर बताया| शीघ्र ही दोनों मे दोस्ती हो गई...माधव शौच के लिए खेतों में चला गया और अपनी पोटली वहीं नदी के किनारे फुक्कन वीर की देख-रेख में छोड़ गया|
कुछ देर के बाद माधव उसी स्थान पर वापस आया तो फुक्कन वीर को वहाँ न पाकर पुकारने लगा- फुक्कन वीर कहाँ हो मित्र?
किंतु कई बार पुकारने के बाद भी जब कोई उत्तर नही मिला तो घबरा कर इधर-उधर ढूँढ़ने लगा.. परंतु उसे फुक्कन वीर कहीं न मिला वह समझ गया कि वह उसकी पोटली लेकर भाग गया | माधव बहुत दुखी हुआ, उसकी पोटली में ही उसके कपड़े, खाने का कुछ सामान और भाई से लिए गए पैसे रखे थे, अब उसके पास कुछ भी नही था वो पापस घर भी नहीं जा सकता था.... दुखी होकर वह वहीं बैठ गया, क्या करे क्या न करे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, दिन छिप चुका था, वह उठा और दिशा हीन सा एक ओर चल दिया कुछ देर चलने के उपरांत वह एक बगीचे में पहुँचा...रात बहुत हो चुकी थी भूख के मारे उसके पेट में चूहे दौड़ रहे थे, खाने को तो कुछ था नही, रात बिताने के लिए उसे यह स्थान उचित लगा... रात के अँधेरे में उसे कुछ दूरी पर एक कुटिया दिखाई दी, वह आश्रय की उम्मीद में उधर चल दिया, कुटिया के सामने कुछ दूरी पर ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ थीं जिनमें यदि व्यक्ति छिपना चाहे तो बैठकर आसानी से छिप सकता था....माधव झाड़ियों के पास पहुँचा तभी कुटिया में कुछ हलचल सुनाई दी, माधव के पैर ठिठक गए...उसने काले वस्त्रों मे कुछ लेगों को बाहर आते देखा तो झट से झाड़ियों के पीछे छिप गया....ये लोग उसे ठीक नहीं लग रहे थे..उनमें से एक बोला-सरदार आज किसको शिकार बनाने का इरादा है? 
शहर के साहूकार को..उनका सरदार बोला, और इसप्रकार बातें करते हुए वो लोग वहाँ से चले गए | 
माधव किंकर्तव्यविमूढ़ सा उन लोगों को देखता रहा, वो लोग आठ थे...माधव समझ चुका था कि वो चोर-लुटेरों की कुटिया में आ गया है वो वहाँ से भागना चाहता था किंतु अर्धरात्रि के अँधेरे में वो कहाँ जाए, अभी इन्हीं झाड़ियों में पड़ा रहता हूँ सवेरे सूर्योदय से पहले ही चला जाऊँगा ऐसा सोचकर माधव वहीं झाड़ी के पीछे लेट गया और उसकी आँख लग गई....
अचानक किसी की आहट से माधव की निद्रा भंग हुई..शायद कोई उसके बिल्कुल पास से गुजरा था, वह सावधानी पूर्वक उठा और देखा तो वही काले वस्त्रधारी लुटेरे वापस आ चुके थे, उनके हाथों में गठरियाँ थीं...सरदार आज तो बहुत माल हाथ लगा है, उनमें से एक बोला
हाँ अब तुम लोग शीघ्रता से नीचे जाओ रात का अंतिम प्रहर समाप्त होने वाला है, कुछ ही देर बाद लोगों का आवागमन आरंभ हो जाएगा' कहते हुए सरदार ने एक पोटली से निकालकर जल्दी-जल्दी गेरुए वस्त्र पहने और जटाओं का नकली विग लगाया, वहीं पर बिछे आसन को हटाया और उस तख्त को हटाया जिस पर आसन बिछा था, सभी लुटेरे एक-एक करके वहाँ से नीचे उतरने लगे शायद वहाँ सीढ़ीनुमा कोई मार्ग होगा जो माधव को दिखाई नहीं दे रहा था, सभी लुटेरों के नीचे जाते ही उस साधु बने लुटेरे ने तख्त यथास्थान रखा और उस पर आसन बिछाकर ध्यान लगाने की मुद्रा में उस पर बैठ गया....यह सब देख माधव स्तब्ध हो गया, रात्रि का अँधेरा अभी भी गहराया हुआ था किंतु उसने अनुमान लगाया कि अब शीघ्र ही सवेरा होने वाला है, वह झाड़ियों के पीछे झुके हुए धीरे-धीरे वहाँ से खिसकने लगा और कुछ ही क्षणों में कुटिया से इतनी दूरी पर था कि सुरक्षित वहाँ से जा सके| उसने साधु बने लुटेरे को पकड़वाने का निश्चय किया और मार्गों पर लगे दिशानिर्देश का अवलोकन करते हुए राजमहल की ओर बढ़ने लगा....वहाँ पहुँचते-पहुँचते सूर्योदय हो चुका था, माधव द्वार पर खड़े द्वारपाल से विनती करके भीतर गया.... 

रात्रि की लूट की खबर सिपाहियों को हो चुकी थी जिसके कारण चारों ओर कुछ अधिक ही हलचल थी, शायद आज दरबार की कार्यवाही रोज की तुलना में अधिक शीघ्र शुरू हो रही थी....महाराज के आने की उद्घोषणा के साथ ही सभी सतर्क हो गए...माधव चुपचाप एक कोने में खड़ा हो गया, उसे लगा कि राजा जी सभी से लूट के विषय में पूछेंगे तो वह उन्हें बता देगा परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ.... माधव ने अपनी पूरी आपबीती मंत्री को सुना दिया
हमें ये तो समझ आ गया कि तुम लुटेरों को जानते हो, हम तुम्हारे साथ चलकर उन्हें पकड़ लेंगे परंतु तुम्हारी पहेली का अर्थ समझ नही आया...एक मंत्री ने कहा,
मंत्री जी मैंने कहा था-"एक तो देखी घर की नारी"
"थूक फजीहत लातन से मारी" मतलब मैंने पहले अपनी पत्नी को देखा जो मेरे फोटो पर थूक कर फजीहत करके लात मार रही थी, और फिर मैने कहा-"दूजा देखा फुक्कन वीर गठरी ले गयो नदी के तीर"
मतलब मैंने दूसरा फुक्कन वीर ठग को देखा जो चोरी से मेरी गठरी नदी के किनारे से ले गया, उसके बाद मैंने कहा-"तीजा देखा जटाधारी लूट शहर आसन धारी" अर्थात् मैने तीसरा एक जटाधारी साधु देखा जिसने शहर को लूटकर इस प्रकार आसन ग्रहण कर लिया कि कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि वो कोई लुटेरा है, फिर मैंने कहा-"चौथा देखा राज-दरबार कोई न पूछे बात हमार" अर्थात् मैंने चौथा ये राज-दरबार देखा जहाँ किसी ने भी मेरी बात नहीं पूछी |

सभी मंत्री प्रशंसा भरी नजरों से माधव को देख रहे थे, माधव मन-ही-मन गर्व का अनुभव कर रहा था....मंत्री सिपाहियों को लेकर माधव के साथ उसी कुटिया पर पहुँचे जहाँ साधु बैठकर माला जप रहा था....सिपाहियों के साथ मंत्री जी को देखकर वह बोला-आओ पुत्र इस सन्यासी की कुटिया में तुम्हारा स्वागत है, कहो कैसे आना हुआ?
साधु महाराज रात में शहर में बहुत बड़ी चोरी हुई है, हम उन्हीं चोरों को ढूँढ़ रहे हैं...मंत्री जी ने कहा,
ये तो सन्यासी की कुटिया है पुत्र, हम तो मोह माया से कोसों दूर हैं, तुम्हें कहीं और जाकर ढूँढ़ना चाहिए...साधु ने कहा
नहीं महाराज हमारा मन कहता है कि हमें चोर और चोरी का सामान दोनों यहीं मिल जाएँगे, कहते हुए मंत्री ने साधु की दाढ़ी पकड़कर खींचा किंतु ये क्या दाढ़ी तो मंत्री जी के हाथ में ही रह गई.....साधु बना बहरूपिया भागने को तत्पर हुआ तभी दूसरे सिपाही ने उसे पकड़ लिया और अन्य सिपाहियों ने तहखाने में जाकर बाकी के चोरों समेत लूट का माल बरामद कर लिया |
राजा ने माधव को पुरस्कार-स्वरूप बहुत-सा धन दिया, माधव प्रसन्न होकर अपने गाँव वापस चल दिया.....

साभार.....मालती मिश्रा