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Thursday, 29 September 2016

जय हिंद जय हिंद की सेना

आज देश में हर घर-घर में मन रही दीवाली है,
शत्रुओं की यह रात उनके कर्मों सी अब काली है।
वीर शहीद हमारे जिन पर देश नाज करता है,
उनके बलिदानों की ज्योति हमने हर हृदय में जला ली है।
पितृपक्ष का मास यह पितरों को तर्पण देते हैं,
देश के सपूतों ने शहीदों को सच्ची श्रद्धा अर्पण कर डाली है।
इस देश का हर सैनिक आज भगत सिंह सरदार है,
चीर डालने को शत्रुओं की छाती उसने हथियार उठा ली है।
चेत जा ऐ शत्रु अभी तू वक्त का रुख पहचान ले,
मत भूल कि हिंदुस्तान की बगिया का ५६ इंची सीने वाला माली है।
"जय हिंद जय हिंद की सेना" की ध्वनि से गूँज रहा अब अंबर है,
वीर जवानों के शंखनाद से पवन हुई मतवाली है।
मालती मिश्रा

हम दोनो....

भूल कर सारे गमों को, क्यों न फिर मुस्काएँ हम दोनो.
न था इस अजनबी संसार में कोई अपना कहने को
तुम्हारे आने से खिल उठे गुल वीरान गुलशन केे
छोड़ कर सब रंज जहाँ के, प्रेम पुष्प खिलाएँ हम दोनो.
भूल कर......
मैं पाता था खुद को अकेला इस दुनिया के मेले में
तन्हाई डराती थी मुझे रातों को अकेले में
मिटा कर सारी तन्हाई जहाँ में खुशियाँ फैलाएँ हम दोनों
भूल कर......
मालती मिश्रा

Tuesday, 27 September 2016

तलाश


                   
पलकों मे नींद न थी मन में न था चैन
जाने क्यों हृदय की बढ़ती धड़कनें 
होने लगी थीं बेचैन
रजनी के नीरव संसार में उसे 
धड़कनों की मधुर तान दे रही थी सुनाई
निशि दो पहर से अधिक बीतने को हो आई
चंद्रिका के अस्त हो जाने से 
उपवन में अँधेरे ने अपना परचम फहराया
अम्बर ने थाल के मोती जमीं पर बिखराया
वह उसी रजनी के तम की गहराई में 
आँख गड़ाए न जाने क्या देखना चाहती
कदाचित अपने-आप को तलाशती
भूत वर्तमान भविष्य कभी-कभी 
छिपते तारों के रूप में चमक उठते
रसीली कल्पनाओं के हृदय घट भर उठते।
मालती मिश्रा

Monday, 26 September 2016

श्रद्धांजलि

सच्ची श्रद्धांजलि के लिए बातों की नही कर्मों की आवश्यकता है, तो क्यों न शहीदों को तन-मन ही नहीं धन से भी श्रद्धांजलि अर्पित करें.....

देकर अपने प्राणों की आहुति
हमको सुरक्षा दे जाते हैं,
रातों की नींद गँवाकर अपनी
हमें बेफिक्र सुलाते हैं
सर्दी-गर्मी सब झेलते हुए
जो सदा कर्तव्य निभाते हैं
हमारी सुरक्षा की खातिर जो
अपना परिवार असुरक्षित कर जाते हैं
ऐसे वीर सपूतों के लिए
क्यों न हम भी कुछ कर्तव्य निभाएँ
अपने खुशियों के समंदर से
कुछ घड़ों की खुशियाँ अर्पित कर आएँ
कह-कहकर तो हमने उन्हें
बहुत श्रद्धांजलि अर्पित किया
उन शहीदों के सम्मान हेतु
सच्ची श्रद्धांजलि हम अब चढ़ाएँ ।
मालती मिश्रा

शिकवे-गिले



सुबह की मीठी-मीठी सी धूप खिड़की से छनकर कमरे मेंआ रही थी धूप की गरमाहट परिधि को अपने चेहरे पर महसूस हुई तो वह एकाएक उठ बैठी और घड़ी मे समय देखा तो सात बजने वाले थे। वह इतमी देर कभी नहीं सोती पर आज न जाने क्यूँ इतनी देर तक सोती रही, वह कमरे से निकलकर बरामदा पार करती हुई लॉन में आ गई। जनवरी की सर्दी में यह गुनगुनी सी धूप मानो  शरीर को प्यार से सहलाने लगी, हल्की-हल्की सी गरमाहट मन को बहुत अच्छी लग रही थी। वह वहीं कुरसी पर बैठ गई उसके उस छोटे से लॉन के बाद कॉटेज का मेन गेट (जिसकी ऊँचाई को चार-साढ़े चार फिट की होगी) और फिर पतली सी सड़क जिसके दोनो ओर रंग-बिरंगे फूलों के छोटे-छोटे पौधे थे और सड़क के दूसरी ओर परिधि के कॉटेज के सामने से थोड़ा दायीं ओर एक और कॉटेज था जो कुछ दिनों से बंद पड़ा था, उसमें एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे जो अब उसे बेचकर अपने बेटे के पास शहर चले गए। थोड़ी-थोड़ी दूर पर इसी प्रकार के इक्का-दुक्का से कुछ छोटे-बड़े घर इधर-उधर बने हुए थे और फिर काफी दूर तक ऊँची-नीची धरती पर हरियाली बिखरी हुई थी जो सुबह के कुहरे में ढकी हुई कहीं-कहीं से ऐसे झाँक रही थी मानो विशाल सागर में डुबकी लगा के ऊपर को उठ रही हो और उसके इस हरियाली भरे दूधिया सौंदर्य से  पार दूर पेड़ों के झुरमुटों के पीछे से झाँकने का प्रयास करते हुए सूरज ने अपनी सुनहरी किरणों से पेड़ों के मस्तक पर मानों चमकता हुआ स्वर्ण मुकुट पहना दिया है। प्रकृति का यह मनोरम सौंदर्य देख परिधि मन ही मन सोचने लगी कि किस प्रकार सूरज स्वयं के आने से पहले ही अपने अरुण प्रकाश से संसार को अपने आने की सूचना दे देता है, कितना मनोरम होता है प्रातः काल सूर्योदय का यह दृश्य। अचानक उसकी नजर सामने वाले मकान पर पड़ी जो कई महीनों से खाली पड़ा हुआ था, आज वहाँ पर कुछ चहल-पहल का आभास हो रहा था, कोई दिखाई तो नहीं दे रहा था परंतु कमरे से बरामदे का गेट थोड़ा खुला हुआ था, बरामदे में कुर्सियाँ और एक छोटी सी मेज रखी थी, कुछ गत्ते के बड़े-बड़े बंद डब्बे रखे थे शायद उनमें सामान था जो अभी खोला नहीं गया था। मंजू! परिधि ने आवाज दी।
जी दीदी आई, अंदर से आवाज आई और लगभग भागती हुई सी मंजू आ धमकी।
जी दीदी... मंजू ने प्रश्नात्मक मुद्रा में कहा।
वो सामने वाले मकान में कोई रहने आया है क्या? तुझे पता है कुछ?    परिधि ने जिज्ञासा के अतिरेक में एक साथ ही दो-दो सवाल पूछ लिए।
ह...हाँ दीदी, वो लोग शायद रात को ही आए हैं, सुबह जब मैं आई तब तक तो उनका सामान आ चुका था। वो लोग कौन हैं, परिवार में कौन-कौन हैं ये मैं पता लगा के दोपहर तक बता दूँगी। मंजू ने इतने भोलेपन से कहा कि परिधि के होठों पर मुस्कान तैर गई।
अच्छा!! मैंने तो बस यूँ ही पूछ लिया था मुझे तुझसे जासूसी नहीं करवानी। जा काम देख और नहाने का पानी गरम हो गया?
नहीं दीदी बस अभी गरम किये देती हूँ। कहती हुई मंजू भीतर चली गई।
परिधि ने मेज पर रखा अखबार उठा लिया और पेज पलटने लगी, वही रोज की तरह के समाचार कहीं किडनैप, कहीं झपटमारी तो कहीं देश-विरोधी नारे। "ये तो रोज-रोज की यही कहानी हो गई है बस जगह का नाम बदल जाता है बस!" परिधि मन ही मन बुदबुदाई। अरे......ये तो शायद.....परिधि चौंककर ध्यान से अखबार के चौथे पेज पर छपी एक तस्वीर को बड़े ध्यान से देखने लगी जो कि वहाँ पर लिखे लेख के लेखक की तस्वीर थी। य.....ये तो कैलाश है....ये लेख लिखने लगा। सोचते हुए वह उत्सुकतावश पूरा लेख पढ़ गई, बहुत ही संतुलित और प्रभावी लेख था।
अच्छा लिखता है...वह मन ही मन बुदबुदाई। कैलाश....परिधि के होठों के कंपन के साथ ही यह ध्वनि कंपकंपाती हुई निकली, उसके सुंदर और शांत चेहरे पर कुछ विषाद की रेखाएँ घिर आईं। इससे पहले कि  वह अतीत की गलियों में फिर से खो जाती....
दीदी जी पानी गरम करके बाथरूम में रख दिया है आ जाइए नहा लीजिए। भीतर से मंजू की आवाज आई। अचानक आई आवाज से परिधि इसप्रकार चौंक पड़ी जैसे उसे किसी ने गहरी नींद से खींचकर जगा दिया हो, हड़बड़ा कर कुर्सी से उठ खड़ी हुई और "आती हूँ मंजू" कहती हुई परिधि ने अखबार को मेज पर रखा और भीतर चली गई।
नाश्ता आदि से निवृत होकर परिधि स्टडी रूम में चली गई, छुट्टी के दिन परिधि का समय स्टडी-रूम में, कुछ देर बाजार आदि घूमने में बाकी सुबह-शाम प्रकृति के सौंदर्य को अपने भीतर समेट लेने के प्रयास में उसकी छटा निहारने में कटता। अचानक उसे आज के अखबार की याद आई, वह बाहर लॉन में आई, पर अखबार वहाँ नहीं था। शायद मंजू ने कहीं रख दिया होगा। भीतर आई बैठक में मेज पर अखबार नहीं था, उसने मंजू को आवाज लगाई- " मंजू आज का अखबार कहीं देखा क्या?"
हाँ दीदी जी वो सामने जो नए पड़ोसी आए हैं, वो माँगकर ले गए, कह रहे थे पढ़कर लौटा देंगे। आप बाथरूम में थीं तो मैने....कहते हुए मंजू चुप हो गई। परिधि का निर्विकार चेहरा देख उसे लगा उसने शायद गलती कर दी। वह बाहर की ओर लपकी "मैं अभी लाती हूँ।"
"नहीं" परिधि झट से बोल पड़ी। "रुक जा, अभी उन्होंने शायद पढ़ा न हो, अपने आप दे जाएँगे और यदि नहीं लाए तो शाम को ले आना, उसमें एक आर्टिकल है बस इसीलिए, नहीं तो वापस माँगती ही नहीं।" कहती हुई परिधि फिर स्टडी रूम की ओर बढ़ गई। अब वह बिल्कुल शांत थी, उसे देख कर यह अनुमान लगाना मुश्किल था कि वह शांत है या उदास।
न चाहते हुए भी बार-बार परिधि का मनो-मस्तिष्क अतीत की गलियों की ओर भागने का प्रयास करता, वह स्वयं को किसी अन्य कार्य में व्यस्त करने का असफल प्रयास करती कभी कोई पुस्तक उठाकर पढ़ती, कभी कोई अन्य पुस्तक के पन्ने पलटने लगती, परंतु मस्तिष्क से कैलाश की छवि नहीं हटा पा रही थी। वह बार-बार दिलो-दिमाग को पीछे की ओर खींचता। ओह! क्या करूँ मैं? क्यों !! क्यों!! आज फिर मेरा मन इतना बेचैन हो रहा है? क्यों  दिल फिर से अतीत के पन्ने उलटना चाहता है? क्या नहीं है मेरे वर्तमान में, क्यों सोचूँ मैं उन घड़ियों को जो मेरी होकर भी मेरी नहीं थीं? क्यों?
प्रकृति से उसे बचपन से ही प्रेम था, दूर-दूर तक फैले हुए हरे-भरे खेत, आसमान को छूने की कोशिश करते ऊँचे-ऊँचे पेड़, कल-कल करती नदी और तट पर जहँ-तहँ दूर-दूर छिटके रंग-बिरंगे जंगली फूलों के छोटे-छोटे पौधे। ये सब उसे अपनी ओर बुलाते। वह उनके साथ घंटों समय बिता सकती थी, जरा भी न ऊबती। प्रकृति की गोद में खेलते कूदते ही वह किशोरावस्था को पार कर एक सुंदर रमणी बन चुकी थी। ग्रामीण अंचल में रहते हुए भी उसने बी०ए० कर लिया था और अब अंग्रेजी विषय से एम०ए० करने की तैयारी कर रही थी।
एम०ए० करने के लिए मुझे शहर जाना पड़ेगा, पर क्या माँ-बापू इसके लिए तैयार होंगे, मैं उन्हें कैसे मनाऊँ? इसी उधेड़-बुन में परिधि नदी के किनारे टहलते-टहलते उस जगह आ गई थी जहाँ से नदी काफी नीचे बह रही थी। परिधि को इसका पता ही न चला, अचानक घास के कारण उसको जमीन दिखाई नहीं दी और वह नदी में गिर गई। "छपाक" की तेज आवाज के साथ एक लड़की की चीख भी सुनाई दी कुछ दूर पेड़ के नीचे बैठे उस युवक को। उसे समझते देर न लगी, वह नदी की तरफ भागा और देखा कि बाहर निकलने के लिए हाथ-पाँव मारती परिधि कभी डूबती कभी उतराती। वह युवक बिना वक्त गँवाए नदी में कूद पड़ा और तैरता हुआ वहाँ तक पहुँच गया। कुछ देर में वह परिधि को कंधे पर डाले नदी के बाहर निकल आया और उसे वहीं घास पर लिटा कर पेट दबाकर पानी निकाला। थोड़ी देर में वह उठकर बैठ गई। बेहोश होने से पहले परिधि ने उस युवक को पानी में कूदते देख लिया था  अतः होश में आते ही उसने अपना दुपट्टा ठीक करने की कोशिश की।
रहने दीजिए नदी की धारा आपको नहीं ले जा सकी तो उसे आपके दुपट्टे से ही संतोष करना पड़ा, युवक ने मुस्कुराते हुए कहा।
उसके इस बेवक्त और बेबाक मजाक पर परिधि भी
मुस्कुरा दी।
आपको इस गाँव में पहले कभी नहीं देखा.....परिधि ने कहा
अच्छा तो जो रोज-रोज दिखाई दे सिर्फ वही आपको बचाने का हकदार है, माफ कीजिएगा मुझे पता नहीं था....उस युवक ने मुस्कुराते हुए मजाक भरे लहजे में कहा।
आप कभी गंभीर भी होते हैं? परिधि ने अपनी मुस्कुराहट छिपाते हुए जानबूझ चेहरे पर गंभीरता लाते हुए कहा।
आप तो लगता है बुरा मान गईं। कमाल है जान बचाने वाले का थोड़ा सा मजाक भी सहन नहीं कर सकतीं।
धन्यवाद तक नहीं किया और गुस्सा और दिखाने लगीं, चलिए आपको फिर से नदी में फेंक देता हूँ अपना दुपट्टा भी ढूँढ़ लाइएगा। कहते हुए वह परिधि की तरफ ऐसे लपका जैसे सचमुच वह उसे उठाकर नदी में ही फेंकने वाला हो।
धन्यवाद जैसा शब्द बहुत छोटा प्रतीत हुआ इसीलिए...
कहते हुए परिधि चुप हो गई।
खैर...खैर... कोई बात नहीं आप इतनी सीरियस मत होइए, मैं तो मजाक कर रहा था। अब ये बताइए आप घर कैसे जाएँगी, आप तो पूरी तरह भीग चुकी हैं और आपका दुपट्टा भी अपना कर्तव्य अधूरा छोड़कर बह गया। कहते हुए पुनः मुस्कुराहट उसके होठों पर तैर गई। उसकी यह मुस्कान न जाने क्यों परिधि के भीतर तक सिहरन भर गई, अब उसे पहली बार यह अहसास हुआ कि वह भीगी हुई बिना दुपट्टे के उस अनजान युवक के समक्ष बैठी है। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया, उसने घुटने सिकोड़ कर स्वयं को छिपाने की असफल कोशिश की।
अचानक वह अचकचा उठी उसे लगा वह उसे पकड़ने वाला है परंतु यह क्या.... उसने अपनी कमीज उतारकर परिधि के कंधों पर डाल दी थी। थैंक्यू.... परिधि ने कहा।
चलिए आपको घर तक छोड़ देता हूँ, सूर्यास्त होने वाला है। युवक ने कहा
परिधि बिना कुछ बोले उसके साथ चल दी। दोनों चुपचाप चल रहे थे, इतने चुप कि उन्हें देख कोई नहीं कह सकता था कि अभी कुछ देर पहले दोनों में इतनी बातचीत भी हुई होगी। रास्ते में एक-दो लोगों ने उन्हें इस तरह साथ देखकर पूछा भी क्या हुआ बिटिया? "कुछ नहीं काका ये जरा नदी की गहराई नापने गई थीं।" कहकर युवक ने वहाँ भी बात को मजाक में उड़ा दिया लेकिन पूछने वाले समझ गए कि वह नदी में गिर गई थी, उसे नसीहत भी दे डाली "बिटिया नदी में अभी पानी ज्यादा है तो ज्यादा किनारे पर मत टहला करो।"
परिधि घर पहुँची तो माँ उसे इस अवस्था में देखकर बहुत परेशान हो गईं,. वहाँ भी उसी युवक ने माँ को भी समझाया कि परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।
अच्छा मैं चलता हूँ...कहकर वह चल दिया। फिर एकाएक मुड़ा, मेरी कमीज तो दे दो, इसे अभी मुझसे प्यार है, वह मुस्कुराते हुए बोला।
परिधि ने झट से कमीज उसे पकड़ा दी। वह बिना कुछ बोले चला गया। न ही परिधि को न ही उसे यह ध्यान रहा कि वो एक दूसरे का नाम पूछते।
माँ क्या आप जानती हैं उसे? इतना बक-बक करता है कि मुझे ये तक याद नही रहा कि नाम भी पूछ लूँ। इससे पहले कि माँ उसे कुछ कहतीं उसने ही सवाल दाग दिया।
हाँ, वो गाँव के किनारे जो कोठी है गोपाल दास जी की, ये उन्हीं का बेटा है। माँ ने कहा ।
पर आज से पहले तो मैंने कभी इसे गाँव में देखा नही... परिधि बोली
वो शहर में रहता है न, पढ़ाई कर रहा है। माँ ने बताया, अब तू जा जाकर कपड़े बदल ले नही तो बीमार पड़ जाएगी।
अब इतना बताया तो ये भी बता दो उसका नाम क्या है? परिधि अपनी जिज्ञासा को रोक न सकी और माँ से पूछ ही लिया।
कैलाश... कैलाश नाम है उसका, अब जाकर कपड़े बदल।.   कहती हुई माँ बाहर चली गईं।
कैलाश....अच्छा नाम है, बुदबुदाती हुई परिधि दूसरे कमरे में चली गई।

पूरब में सूरज की लाली फैलने लगी थी आसमान इस प्रकार लाल हो रहा था मानो किसी ने पूरे आसमान में  लाल गुलाल छिड़क दिया हो, पक्षियों का कलरव कानों में मधुर संगीत घोल रहा था, मंद-मंद सी पवन की ठंडक से मन भी शीतल हो रहा था। प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य के रसपान से परिधि कभी विरक्त नहीं होती थी, आज भी वह अपनी सबसे प्रिय सखी मधु के साथ बाग में टहलने जा रही थी। ऐसे सुंदर मौसम का आनंद जिसने नहीं लिया उसने कितनी अनमोल निधि खो दी, है न मधु? परिधि ने कहा।
हाँ वो तो है, पर तू मुझे ये बता कल तू नदी में कैसे गिर गई, और तुझे बचाया किसने था? मधु ने पूछा।
बस पूछ ही मत.....कहते हुए परिधि ने उसे पूरा वृत्तांत कह सुनाया।
और वो कैलाश है न, सचमुच कल वो मेरे लिए तो फरिश्ता बनकर आया, पर इतना बोलता है कि किसी और को तो बोलने का मौका ही नहीं देता, उसकी हर बात मजाक से शुरू होकर मजाक पर ही खत्म होती है। यहाँ तक कि मुझे उसने नाम तक पूछने का मौका नहीं दिया, पर है बड़ा ही भ.....
अरे बस...बस....बस परिधि को लगातार बोलते देख मधु ने रोका, अब अपना ये कैलाश पुराण बंद कर दे, कितनी तारीफ करेगी उसकी।
मैं कुछ ज्यादा बोल गई? उसने हड़बड़ा कर पूछा।
वो देख... अचानक मधु ने एक ओर इशारा किया
ऐं ये यहाँ भी.... आश्चर्य और प्रसन्नता के मिले-जुले भाव परिधि के चेहरे पर एक साथ उभर आए, उसका सुंदर मुखड़ा और खिल उठा। यह देख मधु ने उसके मन में उत्पन्न होने वाले उन कोमल भावों को भी पढ़ लिया जिससे उसकी सखी खुद भी अनजान थी।
अनायास ही वे दोनो उस सजीले नवयुवक की ओर बढ़ गईं।
आप यहाँ क्या कर रहे हैं? परिधि ने पूछा
हंह... वो बाग के बाहर ऐसा कोई बोर्ड नहीं दिखा जिसपर ये लिखा हो कि यहाँ हवाखोरी के लिए सिर्फ लड़कियाँ ही आ सकती हैं इसलिए मैं भी चला आया, सोचा जॉगिंग के लिए इससे अच्छी जगह हो ही नही सकती।
देखिए कैलाश बाबू....
अरे वाह रात भर में मेरा नाम भी पता कर लिया परिधि जी ने, लगता है रात भर मेरे बारे में ही सोचती रही हैं आप।
आपको मेरा नाम कैसे पता? परिधि ने तुनक कर कहा।
अरे भई जब गाँव में कोई लड़की नदी में छलाँग लगाती है न, तो अनजानों को भी नाम पता मालूम हो जाता है, फिर मैंने तो जान बचाई है आपकी।
आप कल से अहसान दिखाए जा रहे हैं, कोई जान बचाने वाला ऐसे बार-बार ताने देता है क्या.... परिधि रुआँसी सी होकर बोली, वह ये भूल ही गई थी कि उसके साथ मधु भी है जो बस दो कदम की दूरी पर खड़ी दोनों की नोंक-झोंक का आनंद ले रही थी।
नहीं-नहीं आप बुरा मत मानिए, दोस्तों से मैं ऐसे ही बात करता हूँ, फिर हम तो एक ही गाँव के हैं, क्या हम दोस्त नहीं हो सकते? कहते हुए कैलाश ने उसकी ओर अपना हाथ बढ़ा दिया...
क्यों नहीं... कहते हुए अचानक ही मधु ने उसका हाथ कैलाश की ओर बढ़ा दिया।
अब तीनो इसप्रकार घुल-मिल  कर बातें कर रहे थे जैसे कि पुराने मित्र हों।
कैलाश जी आपने क्या किया है? मेरा मतलब पढ़ाई कहाँ तक...परिधि ने आगे की बात जानबूझ कर अधूरी छोड़ दी।
पी०एच० डी० कर रहा हूँ, हिंदी साहित्य से।
और परी तुम.... मैंने सुना है कि तुम भी उच्च शिक्षिता हो, काफी होशियार हो....
वह चुपचाप उसका मुँह देखती रही....
क्या हुआ? मैने कुछ गलत कहा..... कैलाश ने पूछा
कैलाश बाबू इसका नाम परिधि है....मधु ने कहा
तो क्या हुआ मैं प्यार से परी कहना चाहता हूँ... नाम बुरा है क्या?
नहीं आप कह सकते हैं, बहुत अच्छा लगा.... परिधि जैसे अपने आप से ही बड़बड़ाई।
फिर क्या था दोनों अक्सर मिलते कभी बगीचे में कभी नदी किनारे घंटों टहलते रहते, उनकी बातें ही कभी समाप्त नहीं होतीं।  कभी पढ़ाई से संबंधित कभी गाँव और गाँव वालों से। धीरे-धीरे दोनों के बीच कभी न टूटने वाला रिश्ता बन गया प्रेम का रिश्ता। कैलाश कहता शहर में कॉलेज में तुम्हारा दाखिला मैं करवा दूँगा, तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं।
और उसने ऐसा ही किया भी परिधि का एडमिशन करवा दिया वह हॉस्टल में रहकर पढ़ती दोनों एक ही शहर में थे तो हर हफ्ते, कभी-कभी हफ्ते में दो बार भी मिलते और साथ समय व्यतीत करते। दोनों ही अब एक-दूसरे के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकते थे।
कैलाश के घर में किसी का विवाह था तो उसे गाँव जाना पड़ा, पंद्रह दिनों तक उसके बिना कैसे रहूँगी, यह सोचकर परिधि भी गाँव आ गई।
विवाह के कार्यों में व्यस्तता के बावजूद कैलाश रोज सुबह और शाम को अपनी परी से मिलने का समय निकाल ही लेता।

दो दिन हो गए मधु से मुलाकात नहीं हुई, ऐसा तो कभी नहीं हुआ फिर क्या बात हो गई? सोचकर परिधि मधु के घर की ओर चल पड़ी।
आँगन का दरवाजा खुला था, आँगन पार करके बरामदे की सीढियाँ चढ़ ही रही थी कि उसे भीतर से कैलाश की आवाज आई। वह जल्दी-जल्दी दो ही कदमों में बरामदा पार कर कमरे के दरवाजे तक आ गई, दरवाजे को हल्के हाथ से धकेला तो वह थोड़ा सा खुल गया, सामने उसे कैलाश खड़ा दिखाई दिया, उसका बाँया हिस्सा दरवाजे की ओर था इसलिए वह परी को देख न सका।
हाँ काका मैं मधु से विवाह करूँगा, बस मुझे दस-पंद्रह दिन का समय दे दीजिए। कैलाश की यह बात सुनकर परिधि को चक्कर आ गए, पैर काँपने लगे,उसे ऐसा लगा मानो किसी ने उसका दिल अपनी मुट्ठी में भींच लिया हो, जब वह खुद को संभाल न सकी तो लड़खड़ा कर वहीं दरवाजे की ओट में बैठ गई।
दो-चार मिनट तक उसी अर्द्ध मूर्छा की स्थिति में बैठी रही, फिर धीरे से उठकर अपने घर की ओर चल दी।
जैसे-तैसे वह घर पहुँची और अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोई।
क्यों कैलाश, क्यों किया तुमने ऐसा? मेरी सबसे प्रिय सखी और मेरा कैलाश दोनों ने मिलकर मुझे धोखा दिया... इस प्रकार के न जाने कितने सवाल उसके मनो-मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह वार कर रहे थे। उसका मन कर रहा था कि अभी जाए और दोनों से पूछे कि उन्होंने उसके साथ ऐसा क्यों किया.... पर अब ऐसा करके भी क्या फायदा, जो रिश्ता एकबार कलंकित हो चुका उससे सवाल-जवाब करके उसे शुद्ध तो नहीं किया जा सकता। वह रोते-रोते सो गई।

कहीं जा रही हो क्या बेटा? उसे अपने कपड़े बैग में रखते देख माँ ने पूछा।
हाँ माँ मैं वापस जा रही हूँ। परिधि ने कहा
पर तू तो पंद्रह दिनों के लिए आई थी। माँ ने अचंभित होकर कहा।
माँ यहाँ रहकर पढ़ाई का बड़ा नुकसान हो रहा है, तो आप मुझे रोकना मत। कहकर वह कपड़े बदलने चली गई।
माँ उसके इस अजीब व्यवहार से अचंभित रह गईं।
शहर जाकर परिधि ने सबसे पहले अपना हॉस्टल बदल दिया, फिर माँ के नाम पत्र लिखकर उन्हें हॉस्टल बदलने तथा नए हॉस्टल का पता बताया और मधु, कैलाश और किसी अन्य सहेली को पता बताने से मना कर दिया। इसके बाद परिधि पाँच-छः सालों तक गाँव नही गई। माँ बापू ही मिलने आ जाते थे।

अचानक डोर बेल बज उठी, परिधि की तंद्रा भंग हो गई। ओह... कितनी देर हो गई, दोपहर के दो बज गए ये मंजू ने अभी तक लंच नहीं बनाया....बड़बड़ाती हुई परिधि स्टडी रूम से बाहर आई।
दीदी जी ये लीजिए आज का अखबार...और खाना लगा दिया है, मैं आपको बुलाने ही आ रही थी... कहते हुए मंजू ने अखबार परिधि की ओर बढ़ाया। उसने चुपचाप अखबार ले लिया और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गई।
मंजू वो जो परिवार सामने के घर में आए हैं, कितने मेंबर हैं?..... खाना खाते हुए परिधि ने पूछा
दीदी जी मुझे पता नहीं पर दो बच्चे देखे थे, अभी अखबार वापस देने आए थे, बड़ी लड़की है और कोई चार-पाँच साल का लड़का है।
अच्छा ऐसा कर तू अभी खाना खा ले फिर उनके घर चली जा, अभी-अभी शिफ्ट किया है, फिर क्या पता इस जगह  नए हैं,  तो हो सकता है किसी सहायता की आवश्यकता हो, पूछ लेना और सामान वगैरा लगवाने में सहायता की जरूरत हो तो वो भी कर देना, यहाँ का काम मैं कर लूँगी.... परिधि ने कहा।
जी मैं चली जाऊँगी पर यहाँ का काम भी मैं कर लूँगी आप मत करना, कोई ज्यादा नहीं है।.  मंजू रसोई की ओर जाती हुई बोली।

दो दिन हो गए थे परंतु अभी तक परिधि ने नए पड़ोसियों को देखा तक नहीं था, वह बैंक में मैनेजर है, सुबह नौ बजे बैंक चली जाती है और शाम को पाँच बजे वापस आती है, फिर अपने रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त हो जाती है।
उसके बैंक में एक नया ऑफिसर आया है जो उसके ही गाँव के पास वाले गाँव से है। पुरानी जान पहचान न होते हुए भी सिर्फ यह जानकर कि वो पड़ोसी गाँव का है, परिधि को अजीब सा अपनापन लगने लगा है।
क्या मैं अंदर आ सकता हूँ मैडम? ऑफिस के गेट पर खड़े सुधीर ने पूछा।
अरे आइए मिस्टर सुधीर, मैं अभी आपके विषय में ही सोच रही थी।
कहिए मैडम कुछ काम हो तो बताइए.....सुधीर ने कहा।
नहीं....नहीं.... मैं तो दरअसल यह सोच रही थी कि आप यहाँ पर अभी आए हैं, तो आपको तो कई कामों में परेशानी हो रही होगी, मसलन आपने बच्चों का एडमिशन वगैरा करवाने में?  परिधि ने कहा।
जी हाँ मैडम, आपके पास अभी यही पूछने आया था कि कोई अच्छा स्कूल हो आस-पास तो प्लीज बताएँ। सुधीर ने कहा
जरूर सुधीर जी, लेकिन आप एक काम क्यों नहीं करते, पहले अापकी कॉलोनी के बच्चे कहाँ जाते हैं ये पता कीजिए अगर वो ठीक न लगे तब कहीं और कोशिश कीजिए। परिधि ने कहा।
आप सही कह रही हैं, मैं आज ही पता करता हूँ फिर बताता हूँ आपको। मैडम वैसे तो हम अभी-अभी यहाँ आए हैं किसी को जानते नहीं, आप हमारे पड़ोसी गाँव की हैं इसीलिए अपनापन महसूस होता है, मेरी पत्नी आपसे मिलना चाहती है, अगर मैं आपको किसी दिन डिनर पर आमंत्रित करूँ तो क्या आप आएँगी। सकुचाते हुए सुधीर ने पूछा।
क्यों नहीं सुधीर जी, जरूर आऊँगी पर पहले आप लोग अच्छी तरह सैटल हो जाएँ, बच्चों के एडमिशन करवा लें फिर। परिधि ने कहा।
सुधीर आश्वस्त होकर अपने केबिन में चला गया।

संध्या के आठ बज रहे थे परिधि बरामदे में बैठी थी, रात की काली चादर ने प्रकृति के सौंदर्य को ढँक लिया है, अब सुंदरता दिखाने की बारी आसमान की थी, जहाँ चंद्रमा पतली सी हसिया के आकार में अपनी सोने सी छटा बिखरा रहा था किंतु उसकी आभा केवल उसके आस-पास तक ही सीमित थी, वह पृथ्वी तक पहुँचने में असमर्थ थी। आकाश की विशाल थाल हीरे समान जगमगाते तारों के समूह से भरा हुआ था। आसमान का यह सौंदर्य देखते हुए परिधि न जाने किन खयालों में खोई हुई थी कि तभी गेट पर दो मानवाकृति दिखाई दी। बिजली की मद्धिम रोशनी में वह पुरुष आकृति कुछ जानी- पहचानी सी लगी। मंजू अपने घर जा चुकी थी इसलिए परिधि को स्वयं ही गेट खोलने के लिए उठना पड़ा।
कौन....कौन है गेट पर?  कहते हुए वह बाहर की ओर बढ़ी....
हम आपके नए पड़ोसी.... पुरुष आकृति की आवाज आई।
परिधि को आवाज भी जानी- पहचानी लगी।
तब तक वह पास आ चुकी थी, और वह आकृति स्पष्ट हो गई। अरे सुधीर जी आप, आप हमारे नए पड़ोसी हैं, पहले क्यों नहीं बताया ! आश्चर्य और प्रसन्नता में डूबी परिधि ने गेट खोल दिया उसका ध्यान महिला की ओर नही गया।
परिधि..... अचानक महिला ने पुकारा...जो अब तक अवाक् सी बाहर ही खड़ी थी।
परिधि को मानो गर्म तवे पर पैर पड़ गया वह झटके से चौंक कर रुक गई और उसी तेजी से पीछे मुड़ी।
य....ये तो मधु की आवाज है....इतने सालों में भी वह मधु की आवाज नहीं भूली।
मधु !  त्...त्..तुम यहाँ.... अब तक मधु भी बरामदे में आ चुकी थी।
मैडम जी मैने तो सोचा ही नहीं था कि हम आपके पड़ोसी हैं, हम तो आपके सुझाव पर अमल करने के लिए यहाँ आए थे। आप पड़ोस के गाँव की हैं ये तो पता था पर मेरी ससुराल की हैं ये नही पता था मुझे। अब मैं समझ गया कि आप मेरी पत्नी मधु की वही बचपन की सबसे अच्छी सखी हैं, जिसके वह आज भी गुण गाती है। सुधीर भावातिरेक में एक साथ बोल गया परंतु परिधि को इस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी धमनियों मे रक्त प्रवाह रुक गया है, वह इस समय मधु का स्वागत करे या नहीं, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मधु ही थी जिसने उसकी दुनिया लूट ली थी, उसका मन कर रहा था कि वह पूछे कि अब क्या लेने आई है? क्या कुछ और भी दिखाई पड़ रहा है उसके पास जिसे वह छीन सके। परंतु वह बोल कुछ न सकी।
बिना किसी को कुछ बताए कहाँ गायब हो गई थी तू  और क्यों? मुझे आज तक समझ में नहीं आया। कहते-कहते मधु का गला भर आया, वह आगे बढ़कर परिधि से ऐसे लिपट गई जैसे कुछ हुआ ही न हो। परंतु परिधि की बेरुखी का अहसास उसे भी हो गया वह पीछे हटकर खड़ी हो गई।
बैठिए आप लोग, बैठिए न...  कुर्सी की ओर संकेत करते हुए परिधि ने कहा।
सुधीर को भी कुछ असहजता का अनुभव हुआ, बचपन की सखियों का मिलन उसे कुछ फीका-सा लगा। उसने एक कुरसी मधु की ओर सरका दिया और दूसरी पर खुद बैठ गया। मैं पानी लेकर आती हूँ, कहती हुई परिधि अपनी आँखों में आए पानी को छिपाती हुई भीतर जाने लगी... नहीं परिधि रुको न, हम यहीं से तो आए हैं प्यास नहीं, तुम भी बैठो.... कहती हुई मधु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
परिधि ने दूसरे हाथ से आँखे साफ कीं और पलट कर आई और तीसरी कुरसी पर बैठ गई।
तुम दोनों पति-पत्नी हो.... परिधि ने इस प्रकार कहा जैसे वह विश्वास करना चाहती हो कि यही दोनों पति-पत्नी हैं... दरअसल उसने इतनी देर में अब पहली बार यह नोट किया कि यहाँ मधु के पति के स्थान पर कैलाश नहीं है बल्कि सुधीर है।
तू शादी में तो थी नहीं तो पहली बार ही देख रही है इसलिए तुझे विश्वास नहीं हो रहा है न.... पर तूने मेरे साथ ठीक नहीं किया.... मधु ने शिकायत भरे स्वर में कहा।
फिर  क्.कैलाश.... परिधि ने बात अधूरी छोड़ दी।
मधु इतने सालों बाद परिधि से मिली, परिधि ने चाहे खुलकर उसका स्वागत न किया हो पर वह अब उससे इतने वर्षों की सारी बातें करना चाहती थी, वह उसे छोड़कर जाना नहीं चाहती थी।
परिधि तेरे परिवार का कोई सदस्य दिखाई नहीं दे रहा, कहाँ हैं सब? मधु ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
मैं ही मेरा परिवार हूँ मधु, मेरे अपने ने ही मेरी दुनिया बसने नहीं दी.... अपने-आप में खोई हुई सी परिधि ने जवाब दिया। उसके मनो-मस्तिष्क में तो सिर्फ एक ही सवाल कौंध रहा था कि कैलाश मधु के साथ क्यों नहीं है?
परिधि!  क्या मैं आज रात यहीं तेरे साथ रह सकती हूँ? मुझे तुझसे बहुत सारी बातें करनी हैं।  मधु ने पूछा।
और तेरे बच्चे.... परिधि ने कहा
आप फिक्र न करें उन्हें मैं संभाल लूँगा। मधु के हृदय की बात समझ सुधीर ने कहा।
ठीक है आओ आप लोग अंदर यहाँ ठंड बढ़ गई है।कहती हुई परिधि खड़ी हो गई।
नहीं आज आप दोनों बातें कीजिए मैं चलता हूँ। गुड नाइट... कहता हुआ सुधीर बाहर की ओर चल पड़ा।
खाना खाया मधु या कुछ बनाऊँ?  परिधि ने अनमने भाव से ही मानवता के कारण पूछा।
नहीं मैं तो खाकर आई हूँ तुमने नहीं खाया क्या?
मधु ने कहा।
मैं खा चुकी हूँ। परिधि ने जवाब दिया।
ऐसा प्रतीत होता है कि मुझे देखकर तुम्हें खुशी नहीं हुई... मधु ने परिधि के चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए कहा। ऐसा लग रहा था कि वह परिधि के अंतर्मन को पढ़ने की कोशिश कर रही है।
मेरी जगह यदि तुम होतीं तो क्या तुम खुश होतीं? परिधि ने पूछा
मैं क्यों खुश नहीं होती परिधि, आखिर कारण का पता मुझे भी तो चले....
चलो आओ बेडरूम में चलते हैं वहीं बात करेंगे.... कहती हुई परिधि बेडरूम की ओर बढ़ गई मधु भी उसके पीछे-पीछे चलने लगी।
दोनों बेड पर बैठ गईं....
हाँ तो परिधि बताओ मैं खुश क्यों नहीं होती?  मधु ने कहा।
कैलाश.... कैलाश कहाँ है मधु?
परिधि ने सर्द स्वर में कहा।
इस बात का मेरे प्रश्न से क्या संबंध है? मधु ने अचकचाते हुए पूछा।
क्यों नहीं है मधु?  वो तो तुझसे शादी करने वाला था न?
अचानक मधु के पैरों तले जमीन खिसक गई... उसे मानो काटो तो खून नही....तू ये क्या कह रही है? तुझसे ऐसा किसने कहा? मधु ने हड़बड़ाकर पूछा।
मैंने खुद उसे तेरे ही घर में तेरे और तेरे माँ-बापू के सामने कहते सुना था। क्या अब भी कहेगी कि मैं झूठ बोल रही हूँ?  तुझे नहीं पता था कि मैं उससे कितना प्यार करती थी....तुम दोनों ही मेरे लिए बहुत प्रिय और विश्वसनीय थे और तुम दोनों ने ही मेरी दुनिया उजाड़ दी....फिर पूछती है कि मैं छोड़कर क्यों आ गई?  मैं आज खुश क्यों नहीं हूँ?  मुझे तो बस ताज्जु़ब बस एक बात का हो रहा है कि तेरा पति सुधीर कैसे, कैलाश क्यों नहीं????
मधु की आँखों से लगातार अश्रुधार बह रही थी, वह चाहकर भी स्वयं को रोने से रोक नहीं पा रही थी। मैं कितनी अभागी हूँ कि मेरी ही वजह से मेरी सबसे प्रिय सखी का जीवन उजाड़ हो गया, काश उस दिन मैं थोड़ा धैर्य रख लेती.....काश तू थोड़ा धैर्य रखकर घर छोड़ने से पहले सच्चाई पूछ लेती.....तुझे मुझसे लड़ना चाहिए था पगली...तू अपनी दुनिया त्याग आई....अरे तुझे तो आज तक ये भी नहीं पता कि कैलाश के लिए तेरे दिल में प्यार के भाव तुझसे पहले मैं समझ गई थी...... फिर मैं ही तेरी बर्बादी का कारण बन गई....... कहते-कहते मधु सिसक पड़ी।
परिधि अवाक् सी मधु को देखती रह गई, उसने मधु को गले से लगा लिया। मधु खूब रोई।
कुछ देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही बस बीच-बीच में मधु की सिसकियाँ सन्नाटे को भंग करती रहीं।
परिधि ने गिलास मधु की ओर बढ़ाते हुए कहा- पानी पी ले और मुझे बता कि जो मैंने देखा वो सब क्या था?
मधु ने पानी पीया और गिलास एक ओर मेज पर रख दिया और एक लंबी साँस लेकर बोलना शुरू किया....
मैं और सुधीर एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे...
हम दोनों ने अपनी सीमाएँ लांघ दी थीं जिसका परिणाम यह हुआ कि मैं प्रेगनेंट हो गई, तू भी उन दिनों शहर में अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी और सुधीर नौकरी के लिए परीक्षा की तैयारी कर रहे थे तो वो भी शहर चले गए थे। जब मुझे पता चला तो मैंने सुधीर के पास पत्र भेजे पर वो उन तक पहुँचे ही नहीं मुझे लगा सुधीर जानबूझ कर मुझसे दूरी बना रहे हैं, उन्होंने मुझे धोखा दिया। इधर मेरी तबियत बिगड़ने लगी तो माँ को पता चल गया और माँ-बापू ने मुझे बहुत खरी-खोटी सुनाई, यहाँ तक कि माँ ने मुझे मर जाने तक को कह दिया, सही भी था समाज में उनकी क्या इज्ज़त रह जाती.... मुझे भी लगा कि अब सुधीर से भी कोई आशा न थी.... मुझे लगने लगा कि मेरा मर जाना ही सबके हित में होगा और मैं नदी में कूद गई।   वहाँ कैलाश बाबू ने मुझे कूदते  देख लिया और मेरी जान बचा ली। फिर मुझे लेकर घर आये और माँ-बापू को समझाने लगे। पर बापू ने यही पूछा कि लोगों से सच्चाई कैसे छिपाएँ.... गाँव में तो वह किसी को मुँह दिखाने लायक भी नहीं बचे....तब माँ-बापू को तसल्ली देने के लिए ही कैलाश बाबू ने मुझसे शादी का वादा कर दिया पर वह सुधीर को ढूँढ़ना चाहते थे इसलिए उन्होंने पंद्रह दिन का समय भी माँगा ताकि अपने घर की शादी का काम समाप्त कर वो शहर जाकर सुधीर को ला सकें।
मधु बिना रुके लगातार बोलती जा रही थी जबकि परिधि को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे धीरे-धीरे कोई उसके शरीर से रक्त की एक-एक बूँद निकाल रहा हो....उसे अपना दिल मुट्ठी में भिंचा हुआ महसूस हो रहा था....वह निर्विकार बैठी हुई थी और उसकी आँखों से अश्रुधार लगातार बहती जा रही थी।
परि..... परिधि..मधु ने उसे झंझोड़ कर चेतनावस्था में लाने का प्रयास किया...
हं..हं.. परिधि जैसे चौंककर जागृत हुई
तूने मुझे क्यों नहीं बताया था...मैं भी तो वहीं थी... परिधि ने लगभग चीखते हुए कहा......
उसे आज फिर से वैसी ही बेबसी का अहसास हो रहा था जैसा उस समय हुआ था जब उसने कैलाश की मधु से शादी की बात सुनी थी।
हाँ, काश कि मैंने तुझे बता दिया होता, पर उस समय मेरी मनोस्थिति कैसी थी मैं नहीं बता सकती, मेरा किसी से बात करने का मन नहीं करता था, मैं सुधीर को धोखेबाज समझ भीतर ही भीतर मर रही थी, अपने-आप से लड़ रही थी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

अब...अब कैलाश कहाँ है?  तुझे तो पता होगा... परिधि ने बेचैन होकर पूछा
हाँ....वो तुझे बहुत प्यार करता है परिधि.....पागलों की तरह चाहता है तुझे....घर वालों ने कितनी कोशिश की कि वह शादी कर ले पर वो आज भी तेरा इंतजार कर रहा है।
मैं चलूँगी उसके पास मधु प्लीज वहाँ ले चल मुझे, अब और इंतजार नहीं होता...और तू मुझे माफ कर दे, मैं तेरी भी गुनहगार हूँ तुझ पर विश्वास नहीं किया....सच कहती है तू मुझे धैर्य रखकर पूछना चाहिए था तुझसे... सॉरी....परिधि ने मधु के समक्ष हाथ जोड़ दिए।
तू पागल है, सचमुच पागल...कहकर रोते हुए मधु ने उसे गले से लगा लिया।
अब दोनों को नींद कहाँ आती पूरी रात दोनो बातें करती रहीं।
मधु नींद तो मुझे आ नही रही मैं अपने कपड़े पैक कर लेती हूँ, तू मुझे पता बता दे मैं कल ही कैलाश से मिलने जाऊँगी.....
तू जब इतने वर्षों तक रुकी रही तो कुछ समय और धैर्य रख मैं उसे यहीं बुला देती हूँ। मधु ने कहा
जब मुझे धैर्य रखना चाहिए था तब नहीं रखा तो अब मैं बिल्कुल धैर्य नहीं रख सकती, तू मुझे पता बता मैं सुबह ही जाऊँगी.... परिधि की व्याकुलता साफ-साफ महहूस कर सकती थी मधु।
ठीक है पर तू अकेली जाएगी, सुधीर जी को ले जा साथ...मधु ने कहा।
नही..नहीं...मैं अकेली ही जाऊँगी।

बेटा ग्यारह बज चुके हैं अब तो उठ जाइए... बूढ़े काका ने कहा
काका थोड़ा और सोने दो...
रात-रात भर जागते रहते हो और दोपहर तक सोते हो....  कितने साल हो गए हैं सुबह के सूरज का मुख देखे....बिटवा पहले तो मुँह अँधेरे ही उठ जाते थे और अब तो जैसे सुबह के उजियारे से जी चुराते रहते हो...कहते हुए काका बाहर आ गए। अचानक गेट पर कोई स्त्री खड़ी भीतर देख रही थी... काका को देखकर इशारे से उन्हें बुलाया...
ये कैलाश का घर है... परिधि ने पूछा
हाँ, बिटिया पर आप कौन हो...काका ने पूछा
मैं उसके गाँव से हूँ काका.... वो कहाँ है अभी?
बिटिया आप आओ मैं उन्हें जगाता हूँ वो अभी सो रहे हैं.....काका ने बताया
सो रहे हैं....अभी.... परिधि अपने-आप से बड़बड़ाई
काका रुकिए....कहती हुई परिधि काका के पीछे लपकी
आपको कोई एतराज न हो तो मैं भी चलूँ आपके साथ.... परिधि ने कहा
आप....काका को थोड़ा आश्चर्य हुआ
हाँ...काका प्लीज मना मत करिएगा... परिधि ने विनती की।
चलिए.....
बड़ा सा हॉल पार करके दोनों कमरे में पहुँचे, बड़ा सा कमरा, खिड़कियों पर अभी भी धूप से बचने के लिए परदे डाले हुए थे, बेड के दोनों ओर के मेजों पर किताबें और कुछ लेखन सामग्री रखी हुई थीं। दीवार पर बुक शेल्फ तरह-तरह की पुस्तकों से भरी हुई थी। एक ही नजर में परिधि ने कैलाश के बदले हुए जीवन का जायजा ले लिया। उसने काका की ओर देखा और जाकर पहले खिड़कियाँ खोल दीं।
बेटा आपसे कोई मिलने आया है.... काका ने कैलाश को जगाते हुए कहा।
काका उन्हें बिठाओ मैं अभी आता हूँ।....कहकर कैलाश उठ बैठा और..... वह अपनी आँखों को हथेली से रगड़ने लगा, उसे लगा उसकी आँखें धोखा खा रही हैं.....
काका बाहर जा चुके थे।
परी....क्या.... क्या सचमुच तुम हो....
हाँ कैलाश.... मुझे माफ कर सकोगे.... कहती हुई वह रो पड़ी.... कैलाश वने बाँहें फैला दीं, आज उसकी दुनिया उसकी बाँहों में सिमट आई है....दोनों की आँखों से शिकवे-गिले आँसू बनकर बह रहे थे।
मालती मिश्रा

Friday, 23 September 2016

नैना कितने बावरे

नैना कितने बावरे
हर पल हर घड़ी नीर भरे
दुख हो या अतिरेक खुशी का
बिन माँगे मोती बरस पड़े
नैना कितने ....

नीर भरी बदली नयनों में
प्रतिपल अपना राज करे
मुस्काते नयनों की चमक को
तरल आवरण धुँधला सा करे
नैना कितने......

नयनों की भाषा सरल है
निःसंकोच सब सत्य कहे
हिय अंतस में छिपे राज को
बिन बोले यह प्रकट करे
नैना कितने.......

चंचल भोली सी चितवन
मन के सब हाल बयाँ करे
लाख छिपाए जिह्वा जग से
भोले नयना सब खोल धरे
नैना कितने.....

अति भावुक से दो ये नैना
प्रेम के सागर से सदा भरे
दुख-सुख की गहराई पलभर में
अश्कों के निर्झर से झरे
नैना कितने......

नैना दिखाए सत्य जगत का
जीवन में सौंदर्य भरे
पलकों का आवरण इसपर पड़ते ही
जगत अँधेरे में घिरे
नैना कितने......

मालती मिश्रा

Tuesday, 20 September 2016

बदला सैनिकों की शहादत का

  जम्मू-कश्मीर के 'उरी' मे हुए आतंकी हमले में हमारे 18 जवान शहीद हो गए पूरा देश गुस्से से उबल रहा है। पूरे देश को पाकिस्तान से बदला चाहिए, उनको भी आज बदला चाहिए जो अफजल गुरू, याकूब मेमन और बुरहान वानी को शहीद बताते हैं। उन्हें भी बदला चाहिए जो यह तो कहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता किंतु आतंकवादियों के मृत शरीर का अंतिम संस्कार इस्लाम धर्म के अनुसार करवाने की आज भी वकालत कर रहे हैं। फिर आप ही बता दीजिए जनाब बदला कौन ले? अकेले मोदी जी? 
मैं दो-तीन दिनों से बड़े ध्यान से इस हमले से जुड़ी खबरों और लोगों की प्रतिक्रियाओं का अवलोकन कर रही हूँ, शहीदों के परिवारों की दशा देख आँसू छलक पड़ते हैं। ऐसी परिस्थिति में उनके परिवार और गाँव-कस्बे के लोगों का क्रोधित होना और बदले की माँग करना बिल्कुल सही है परंतु हमने किसी भी परिवार को 56 इंच के सीने, अच्छे दिन आदि पर सवाल उठाते नही देखा न सुना। परंतु देश के जो बुद्धिजीवी हैं उनका पहला प्रश्न यहीं से शुरू होता है- "कहाँ गए अच्छे दिन, 56 इंच का सीना सिकुड़ गया" आदि।
आम जनता भावावेश में बहकर तुरंत बदले की माँग करे या यह कहे कि अब हिंदुस्तान को पाकिस्तान पर आक्रमण कर देना चाहिए तो समझ में आता है कि वह राजनीति या कूटनीति की बारीकियाँ नहीं जानती परंतु यदि समाज और देश का बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक पार्टियाँ ऐसी माँग करने लगें या ऐसा न करने के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराने लगें तो यह सिर्फ आम जनता को भड़काने वाली बात होगी, यानी यहाँ भी राजनीति ही हो रही है। 
कम से कम राजनीतिक पार्टियों से तो हम यह उम्मीद करते ही हैं कि उन्हें यह पता है कि पाकिस्तान भी इस समय हिंदुस्तान को युद्ध के लिए उकसा रहा है क्योंकि वह नहीं चाहता कि मोदी जी अपने मकसद यानी पाकिस्तान का हुक्का-पानी बन्द करवाने में सफल हो सकें। 
UN में होने वाली बैठक में मोदी जी पाकिस्तान के आतंकी गुटों के समर्थन का मुद्दा उठाने वाले हैं तथा पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित किया जाए, पूरी तरह अलग-थलग कर दिया जाए इस का प्रयास करेंगे, इसीलिए वह ऐसे हमलों के द्वारा युद्ध के लिए उकसा रहा है। 
भारत के पास पाकिस्तान से बदला लेने के युद्ध के अलावा और भी रास्ते हैं, यदि भारत ने अन्य बड़े देशों को विश्वास में लिए बिना युद्ध शुरू कर दिया तो पाकिस्तान परमाणु छोड़ सकता है, (जिसकी वह पहले से ही धमकी देता है)  इस आशंका के चलते अन्य बड़े देश भारत पर युद्ध रोक देने का दबाव बनाएँगे और चूँकि भारत एक शरीफ और अन्तर्राष्ट्रीय कानून को मानने वाला देश है तो उसे रुकना पड़ेगा। ऐसे में क्या परिणाम हासिल होगा? परमाणु बम भारत के पास भी है पर वह पहले न इस्तेमाल करने के लिए वचनबद्ध है यह बात पाकिस्तान और पूरा विश्व जानता है। 
दूसरा रास्ता भारत के पास यही है कि वह पाकिस्तान को अलग-थलग बिल्कुल अकेला कर दे फिर कार्यवाही करे, जिसकी कोशिश लगातार मोदी जी कर रहे हैं परिणाम भी सामने आ रहे हैं तथा पाकिस्तान की बौखलाहट भी नजर आ रही है।
तीसरा रास्ता है कि पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में आतंकियों के ठिकानों को ढूँढ़ कर नष्ट करना और अब यही होने वाला है। 
मोदी सरकार कमजोर नहीं है इसका पता तो शत्रुओं के खेमें में मची बौखलाहट को देखकर ही लगाया जा सकता चाहे वो शत्रु देश के बाहर के हों या आतंकियों का समर्थन करने वाले भीतर के शत्रु हों।
उरी के इतने बड़े अटैक के बाद भी कश्मीर के कुछ हिस्सों में अभी भी मीडिया या सुरक्षा कर्मियों की गाड़ियों पर पत्थर फेंके जा रहे हैं तो क्या हम यह कह सकते हैं कि यदि हिंदुस्तान पाकिस्तान पर आक्रमण कर भी देता है तो देश कें अंदर के ही दुश्मन इसे कमजोर नहीं करेंगे? जो आज युद्ध न करने के लिए मोदी जी को कायर बता रहे हैं वही युद्ध शुरू होने के बाद दोष भी देंगे कि इन्होंने बिना सोचे समझे इतने जवानों को शहीद कर दिया। 
नहीं भूलना चाहिए कि आज भी हमारे देश में भेड़ की खाल में भेड़िये हैं जो अभी उकसा रहे हैं बाद में पीठ में छुरा घोंपेंगे और फिर किसी नुकसान या अनहोनी के चलते राजनीति करेंगे कि इस सरकार ने देश और देशवासियों की परवाह नहीं की। 
हम मानते हैं कि बदला अब आवश्यक हो गया है किंतु इस प्रकार से घेरकर कि दुश्मन चाहकर भी कुछ न कर सके, इसके लिए पहले से अधिक सशक्त भूमि (रूप रेखा,स्थिति) तैयार करनी होगी ताकि सभी देश हिंदुस्तान का साथ दें और हमारे कम से कम नुकसान के साथ शत्रु देश का अस्तित्व मिटाया जा सके। इसका परिणाम आना भी शुरू हो चुका है, अब उन्हें यह बताना आवश्यक है कि हमारे जवानों की जान इतनी सस्ती नहीं कि कोई भी ले ले।
मालती मिश्रा

Monday, 19 September 2016

वक्त गया अब हिंसा का

वक्त गया अहिंसा का
हिंसा ने अपनी जड़ें जमाई,
अहिंसा के मार्ग पर चलना अब
इस युग में कायरता कहलाई।

सहिष्णुता और उदारता
बस सुनने में शोभा देते हैं,
इन राहों पर चलने वाले
सदा कटघरे में खड़े होते हैं।

दृष्टि रहे सदा लक्ष्य पर
राह अपनी सुविधा अनुसार,
लक्ष्य प्राप्त करने के लिए
हर बाधा का हो सख्त उपचार।

क्यों अपनी क्षति सहन करें
क्यों न अब हथियार उठाएँ हम,
शत्रु समझता जिस भाषा को
क्यों न उसी भाषा में समझाएँ हम।

बहुत हो चुकी सौहार्द की बातें
बहुत हो चुका वार्तालाप,
दिखलाना जरूरी है अब
पापियों को उनकी औकात।

जिस जमीं पर पैर जमा करके
आतंक को पनाह देते हैं,
पैरों के नीचे की वह धरती
हम क्यों न अब खींच लेते हैं।
मालती मिश्रा

Saturday, 17 September 2016

पिघलता अस्तित्व

अपनी नहीं औरों की खुशी को
अपनी खुशी बनाया मैंने,
कष्ट औरों की हरने के लिए
अपना अस्तित्व मिटाया मैंने।

जन्म से युवावस्था के सोपान तक
कर्तव्य वहन सीखने में गुजार दिया,
बाकी का सारा जीवन स्व त्याग कर
अपनों की खुशी पर वार दिया।

ज्यों शमा जलकर तिमिर हर लेता
त्यों सबके जीवन में लाने को सवेरा,
औरों का अस्तित्व बनाने को
बूँद बूँद पिघलता अस्तित्व मेरा।
मालती मिश्रा

Friday, 16 September 2016

जीवन तुम पर वार दिया

नन्हें से कदम पहली बार उठे
पायल जिस आँगन पहली बार बजे
उस आँगन को भी बिसार दिया
अपना जीवन तुम पर वार दिया

जिस बाबुल से दुनिया में नाम मिला
जिस माँ से मेरा अस्तित्व जुड़ा
उन जन्मदाताओं का छोड़ प्यार दिया
यह जीवन तुम पर निसार किया

जिन भाई-बहनों संग किलोल किया
मीठी झड़पें और अठखेल किया
संग हँसने रोने की मीठी यादें वार दिया
तुम संग जीवन सँवार लिया

अपनी खुशियाँ, अपने सपने
लगता न थे वो कभी अपने
तुम्हारी आँखों के सपनो पर हार दिया
उन सपनों को अपना संसार दिया
मालती मिश्रा

Tuesday, 13 September 2016

हिंदी मेरा है अभिमान

 मैं अंग्रेजी में खो गई कहीं
जो कि मेरा विषय नहीं,
अंग्रेजी कौन हो तुम, कहाँ से आई
कैसे अपनी जड़ें जमाई।
बनकर आई जो मेहमान
आज बनी वो सब की शान,
खोकर तुम्हारी चकाचौंध में
अपनी वाणी का भूले मान।
सरलता सहजता और सौम्यता
मेरी भाषा की पहचान,
मुझको भाती हिंदी की बिंदी
मस्तक चढ़ बढ़ाती शान।
हिंदी बसती मेरी आत्मा में
हिंदी मेरा है अभिमान।
संस्कृत जननी इस भाषा की
महानतम गौरव है इसका
संस्कृत हृदय हिंदुस्तान की
हिंदी उसकी धड़कन है,
यह धमनियाँ है राष्ट्र की तो
हिंदी बहता रक्तकण है।
सम्माननीय है संस्कृत मुझको
पर हिंदी मेरी सखी-सहेली,
हिंदी में ही लिखना -पढ़ना
हिंदी में ही मैं खेली।
हिंदी मेरा जीवन आधार
इसमें है मेरा संसार,
सम्मान करूँ मैं हर भाषा की
पर हिंदी से करती मैं प्यार।
मालती मिश्रा

Monday, 12 September 2016

मेरो लल्ला नन्हो सो बालक

मेरो कान्हा को माखन प्यारो
खावन को इत-उत धायो
माँ जसुदा ने मटकिन भर धरी है
कान्हा जित मन उतनो खायो
पर कान्हा तो नटखट ह्वै चले
गोपियन के मटकी फोड़न धायो
कबहुँ कन्हैया को मन उचट्यो
लै ग्वाल-बालन को गोपिन घर घुस आयो
इत-उत निरखे मौका देख्यो
लै सहार गोपन के छीकौं चढ़ जायो
तनिक के खावे अधिक फैलावे
बालन को झिक झिक माखन खवायो
सब कोऊ जाने किसने कियो है
लै शिकायत गोपिन जसुमति घर आयो
नटखट कान्हा के बहानो अनोखो
मोरी बँहियाँ छोटी छीको कैसे चढ़ पायो
मैया तेरो मुझसे सनेह अति भारी
जिससे ग्वाल-बाल मोसे चिढ़ जायो
डाँट खिलावन को तेरो मैया 
सबने मिल कर ढोंग रचायो
माखन सबने मिल खुद खायो है
मोहि अबोध को नाहक फँसायो
तूने मेरो लै माखन भर-भर धरयो है
मैं काहू घर क्यों कर जायो
माँ सकल दिवा मैं गैयन के पाछे
इत-उत जंगल-जंगल धायो
गैयन संग भाग-भाग के मैया 
हाथ-पाँव मेरो दुखन लाग्यो
ता पर ये ग्वालिन सब निष्ठुर
मोरी मैया को मोरे प्रति भड़कायो
कह कन्हैया भये अति भावुक
अँखियन में आँसू भर लायो
देख जसोदा व्याकुल ह्वै गईं
तुरतहि गोपियन को झिड़क लगायो
मेरो लल्ला नन्हो सो बालक
तुम्हरी मटकी कैसे पायो
तुम सबन को भरम भयो है
मेरो कान्हा को नाहक रुलायो
कहि कै मैया भई अति भावुक
लै कान्हा को हृदय लगायो।।
मालती मिश्रा





कानून की दुर्बलता से बलात्कारियों का बढ़ता मनोबल

हमारा देश लोकतांत्रिक देश है यहाँ संविधान को सर्वोपरि रखा जाता है, कानून सबके लिए समान है क्योंकि हम गणतंत्र देश के वासी हैं, यहाँ कानून की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी है ताकि वह पक्षपात न कर सके और सभी को यथोचित न्याय मिल सके। 
परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच सबको निष्पक्ष न्याय मिल पाता है??? इस देश के नागरिक होने के नाते इसके संविधान, इसके कानून का सम्मान करना इसके निर्देेशों का पालन करना हमारा प्रथम कर्तव्य है किंतु दिल मे सम्मान तभी उत्पन्न होता है जब इसमें सभी के लिए समानता दिखाई देती है अन्यथा हम कितना ही क्यों न कहें पर पक्षपात को सम्मान नही दे सकते।
आज से तकरीबन चार साल पहले (१६ दिसम्बर २०१२ को) देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी दुर्दान्त घटना घटित हुई जिसने सिर्फ दिल्ली या इस देश में ही नहीं दूसरे देशों में भी हाहाकार मचा दिया था। इस घटना ने न सिर्फ नैतिकता का हनन किया बल्कि सम्पूर्ण मानवता को शर्मसार कर दिया था। देश का बच्चा-बच्चा इस दुर्दान्त दुर्घटना से वाकिफ है, चलती बस में छः लोगों के द्वारा एक मासूम लड़की का न सिर्फ बलात्कार किया जाता है उसके साथ ऐसी हैवानियत की जाती है कि स्वयं हैवान भी शर्मसार हो जाए। इस घटना से पूरी दिल्ली दहल जाती है हर कोई इस दरिंदगी को जानकर रो पड़ता है, मृत्यु से जूझती निर्भया (मीडिया द्वारा दिया नाम) अपराधियों के पकड़े जाने और उन्हें सजा दिलाने की आस लिए इस जालिम दुनिया से विदा हो गई। अपराधी पकड़े भी गए सबकी निगाहें कानून के फैसले पर टिकी हुई थीं, अपराधियों को दण्ड दिलवाने के लिए न जाने कितने कैंडल-मार्च, आंदोलन आदि भी हुए, फास्ट ट्रैक कोर्ट के लागू होने से एक बार को यह उम्मीद भी जागी कि अब शायद जल्द न्याय होगा......परंतु दुर्भाग्य निर्भया का, दुर्भाग्य उसके माता-पिता का और दुर्भाग्य इस देश का जहाँ ये सभी आज भी इंसाफ के लिए न्यायालय की ओर आशा की मद्धिम होती लौ के साथ टकटकी बाँधे देख रहे हैं।
पर क्या कानून से न्याय पाना इतना आसान है.....

इस वीभत्स दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने पूरे देश को झंझोड़ कर नींद से जगा दिया। 
वो निर्भया जिसका सम्मान वहशियों के द्वारा लूट लिया गया था-
उसको मरणोपरांत २०१२ में ही राष्ट्रपति द्वारा "लक्ष्मीबाई" पुरस्कार से सम्मानित किया गया, 
घटना के बाद ऊषा मेहरा कमीशन का गठन हुआ, जिसमें सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जिम्मेदार विभागों के संवादों की कमी पर तथा संबंधित सुझावों पर रिपोर्टर मांगी गई, 
पहली बार बलात्कार के दोषी को मृत्यु दंड देने का प्रावधान संसद में एक मत से पारित हुआ। 
महिला बाल विकास मंत्रालय ने २४ घंटे हेल्पलाइन नं० शुरू किया।
इस घटना के बाद ही 'राष्ट्रीय महिला आयोग' के लिए "निर्भया भवन" तथा "निर्भया स्मारक कोष" का निर्माण हुआ। 
इतना ही नहीं दिल्ली सरकार द्वारा हेल्पलाइन १८१ शुरू किया गया।
मिनिस्ट्री ऑफ आई टी ने सुरक्षा से जुड़े कई गैजेट बनाने प्रारंभ किए।
निर्भया को २०१३ में अमेरिका द्वारा "इंटरनेशनल वुमेन करेज अवॉर्ड" से सम्मानित किया गया।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट की गाड़ियों में जीपीएस लगने लगे, परंतु इसके बाद भी ऑटो वालों की मनमानी अब भी कायम है।

ये सबकुछ इतनी शीघ्रता से हुआ तो जनता में आशा जागी कि अब निर्भया को शीघ्र ही न्याय मिलेगा। कोर्ट केस के दौरान ही मुख्य आरोपी ने आत्महत्या कर लिया। यह विश्वास और मजबूत हुआ जब फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सुनवाई प्रारंभ हुई और साकेत कोर्ट के द्वारा चार दोषियों को (मृत्युदण्ड) सजा सुनाई गई। परंतु पाँचवा मुजरिम जिसे उसके स्कूल सर्टिफिकेट के आधार पर नाबालिग बताया गया उसे सिर्फ तीन साल के लिए बाल सुधार गृह में रहने की सजा दी गई। यह कैसा इंसाफ था? जाँच के दौरान यह पता चला था कि सबसे अधिक वहशीपन उसने ही दिखाया था तो सिर्फ छः महीने उम्र कम होने से क्या उसका अपराध कम हो गया? जिस इंसान के मन में लेश मात्र भी मानवता नहीं क्या उसे एक और अपराध करने के लिए छोड़ देना न्याय है? निःसंदेह निर्भया की आत्मा फूट-फूटकर रोई होगी। 
इसके अतिरिक्त उन दोषियों को अपील करने की छूट भी जी जाती है और अपील के बाद फिर छः महीने लगे हाईकोर्ट को फैसला सुनाने में लगते हैं। इस बीच अपराधियों ने क्या कुछ नही किया होगा स्वयं को बचाने के लिए।
छः महीने बाद जब हाईकोर्ट सजा बरकरार रखता है तो मुजरिमों को सुप्रीमकोर्ट कोर्ट में अपील की छूट दे दी गई और सुप्रीमकोर्ट ने फाँसी की सजा पर रोक लगा कर उन अपराधियों को न सिर्फ जीने के लिए बल्कि अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए झूठ का मसौदा तैयार करने के लिए कुछ समय और दे दिया। 
चार साल पूरे होने वाले हैं इस दुर्घटना को किन्तु आज तक वो चारों मुजरिम सांस ले रहे हैं। 
क्यों........
क्या यही है कानून की निष्पक्षता.........
क्या यही है न्याय..........
क्या अब भी हमें कानून को पैसे और रसूख वालों का गुलाम नहीं कहना चाहिए?

मुझे आज भी याद है जब मैंने ९ सितंबर २०१३ को 'हिंदुस्तान' मे पेज-९ पर छपी खबर पढ़ी थी जिसमें ७००₹ लूटने के जुर्म में निचली अदालत से सात साल की कैद की सजा पाए एक व्यक्ति की इस सजा को हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस पी गर्ग ने बरकरार रखा। यह घटना १० नवंबर २००९ की थी, जिसमें मात्र आठ महीने में निचली अदालत ने उसे सात साल की कैद की सजा सुनाई थी और हाईकोर्ट में अपील के बाद उसकी सात साल कैद की सजा बरकरार रही। जहाँ तक मुझे पता है पहले बलात्कार जैसे अपराध की सजा भी "सात साल कैद" होती थी, तो क्या हमारे देश का कानून एक स्त्री के मान-सम्मान के हनन उसकी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की कीमत ७००₹ के बराबर मानता है जो दोनों के लूट की सजा बराबर रखी।

मौत से जूझती जिस निर्भया को न्याय दिलाने के लिए पूरा देश एक हो गया था उस निरीह को आज चार सालों के बाद भी न्याय नहीं मिल पाया है। बल्कि अपराधियों को अपने बचाव के लिए कानून के तहत तरह-तरह की सुविधाएँ दी जा रही हैं, सोच कर उस प्रताड़िता पर दया आती है जो न्याय की उम्मीद लिए इस जालिम दुनिया से चली गई। 
उसे तरह-तरह के पुरस्कार, योजनाएँ, स्मारक, हेल्पलाइन नं० आदि की चाह नहीं थी, उसे सिर्फ न्याय (अपराधियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा) की चाह थी ताकि फिर कोई दूसरी निर्भया न पैदा हो।
जिस अपराध का साक्षी उन अपराधियों को पहचानता हो, जिसका अपराध साबित हो चुका हो ऐसे अपराधी को निर्दोष साबित करने का प्रयास करने वाले वकील भी कम अपराधी नहीं होते, क्यों कानून अपराधियों के प्रति ही इतना नर्म रुख अपनाता है? विडंबना तो देखिए जिन वहशियों ने दया के लिए रोती बिलखती गिड़गिड़ाती निर्भया पर दया नहीं किया उनको कानून दयावान होकर इतना अधिकार दे रहा है कि वो न्यायमित्र (संजय हेगड़े और राजू रामचंद्रन) को हटाने की माँग करते हैं। उन्हें इनकी निष्पक्षता पर विश्वास नहीं और कोई इनसे ये नहीं पूछता कि एक अपराधिक मानसिकता वाले व्यक्ति पर कोई क्यों विश्वास करे? 
आज जनता के मनो-मस्तिष्क में यही सवाल है कि क्या फायदा हुआ फास्ट-ट्रैक कोर्ट चलाने का?.....
क्या फायदा हुआ केस की सुनवाई चार के बजाय छः घंटे करने का?.......
क्या भविष्य में भी उन बलात्कारियों की सजा को बरकरार रखने की उम्मीद की जा सकती है?.......

निःसंदेह कानून सर्वोपरि है, परंतु कानून से सदैव न्याय मिलेगा इसकी उम्मीद किन कारणों से की जाय?  यदि दोषी उस सात सौ रूपये के लुटेरे की तरह गरीब और कमजोर है तो कानून उसे जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा देता है और यदि दोषी "याकूब मेमन" जैसा रसूख वालों की सरपरस्ती में जीने वाला पूरे देश का अपराधी हो तो उसे बचाने के लिए यही कानून रात को तीन बजे भी अदालत लगाने को बाध्य हो जाता है। यही कारण है कि अपराधी मानसिकता वाले कानून से नही डरते, बल्कि उनके अनुसार "वो कानून को जेब में लेकर घूमते हैं।" कानून का डर, कानून का सम्मान ये सब सिर्फ गरीबों के लिए है। आज कानून के दाँव-पेंच अपराधियों को सजा देने के लिए नहीं बल्कि उनके रसूख के चलते उनको बचाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। अन्यथा निर्भया के बलात्कारियों को बड़े से बड़े वकील बचाने न आते। सर्वप्रथम होना तो यह चाहिए था कि जिस प्रकार याकूब मेमन के लिए स्पेशल अदालत रात को तीन बजे उसे बचाने के लिए लगाई गई थी उसी प्रकार इन दोषियों के लिए स्पेशल अदालत लगाकर रातों-रात इन्हें फाँसी दे दी जाती ताकि अपराधियों को ये संदेश मिलता कि उनके अपराध अक्षम्य होने पर कानून के दाँव-पेंच उन्हें बचाने में समर्थ न होंगे। परंतु यहाँ तो उल्टा संदेश जाता है।
ऐसे जघन्य अपराध करने वालों की पैरवी करने वाले वकीलों की भी आत्मा मृतप्राय होती है उन्हें भी सिर्फ नोटों की हरी-हरी गड्डी दिखाई देती है, उन्हें एक बार भी यह ख्याल नहीं आता कि यदि उस असहाय लड़की की जगह उनकी अपनी बेटी होती तो क्या तब भी वह इसी प्रकार दोषियों की पैरवी करते? 
यदि वकील इस तरह के केस लड़ना बंद कर दें तो भी अपराधियों के हौसले पस्त होते परंतु यहाँ ऐसा नहीं है, कितना भी बड़ा अपराध करें यदि जेब में पैसा है या ऊँचे पहुँच वालों की सरपरस्ती है तो 95℅ आशा होती है कि वो बच जाएँ, और इसी प्रकार आगे भी अपराध करते रहें। 

नाबालिगों के प्रति कानून के नर्म रुख ने नाबालिगों को अपराध की ओर अग्रसर किया है। 
जब निर्भया के साथ वहशीपन दिखाने वाले नाबालिग को सिलाई मशीन, दस हजार रूपए से सरकार द्वारा ही नवाजा जा रहा है तो क्यों नहीं बड़े-बड़े अपराधी नाबालिगों से ही अपराध कराएँगे?..........और नाबालिग भी तो निडर होकर जुर्म करते हैं पकड़े जाने पर नाबालिग होने का सर्टिफिकेट आगे कर देते हैं और स्वतंत्र हो जाते हैं एक और नए अपराध के लिए।
जबकि होना यह चाहिए कि अपराधी की सजा का मापदंड उसका अपराध होना चाहिए न कि उम्र।
जब एक लड़का जघन्य अपराध करता है वो भी बलात्कार जैसा तो वह प्रमाणित कर चुका होता है कि वह शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व हो चुका है और उसकी मानसिकता विकृत हो चुकी है, ऐसी विकृत मानसिकता वाला व्यक्ति एक स्वस्थ समाज के लिए सिर्फ खतरा हो सकता है इसलिए उसके साथ कोई नरमी बरतना महज अपराध को बढ़ावा देना है। यह हमारे देश के कानून की लचरता का ही परिणाम है कि अपराधी नाबालिग लड़कों को मोहरा बनाकर नित जघन्य अपराध करवाते हैं क्योंकि अपराध करने और करवाने वाला दोनों जानते हैं कि नाबालिग होने के कारण कानून उसे सजा नहीं बल्कि हमदर्दी देगा और परिणाम स्वरूप यही लोग बाद में रेप और मर्डर जैसे जघन्य अपराध करते हैं और २-३ साल में ही नाबालिग होने के नाम पर एक नया अपराध करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं।

हमारे देश का कानून बहुत दयावान है इस बात के लिए विदेशों में इसकी प्रशंसा नहीं होगी बल्कि हमारे देश का कानून निर्भया के बलात्कारियों जैसे खतरनाक अपराधियों को अब तक सजा देने में सफल नही हो पाया, इसकी दुर्बलता पर विदेशों में इसकी निंदा ही होगी। हमारे देश में भले ही लोगों के मनो-मस्तिष्क में इस केस पर समय के धूल की परत जम गई हो परंतु जब हर दिन रेप की नई दुर्घटना की खबर पढने व सुनने को मिलती है तो हर व्यक्ति के मस्तिष्क में यह बात जरूर आती है कि यदि निर्भया के दोषियों को सरेआम फाँसी पर लटकाया गया होता तो आज अपराधी इतने निडर होकर नित नए रेप को अंजाम न दे रहे होते।

Tuesday, 6 September 2016

जीवन एक किताब है

जीवन एक किताब है
इसके हर पन्ने पर लिखी
एक नई कहानी है
शैशवावस्था की किलकारियों से
सजा हुआ है इसका पहला पन्ना
खुशियों की हँसी 
वो चहकती मचलती सी अठखेलियाँ
पन्ने के हर हरफ पर लिखी
एक नई गुनगुनाती सी लोरी
माँ का वो ममता भरा आँचल
लड़खड़ाते हुए कदमों को
मजबूत सहारा देती
पिता की उँगली का हर अहसास है
जीवन एक किताब है

इसके हर पन्ने पर लिखी है
एक नई कहानी
कभी बचपन तो कभी जवानी
सखियों संग के अलबेले से पल
कभी स्कूल कभी घर का चौबारा
कभी नदिया तो कभी वर्षा की धारा
स्कूल न जाने के बहाने ढूँढती
झूठ-मूठ के दर्द दिखाती
नए-नए स्वांग रचाते
वो खट्टे मीठे से अनोखे पल
पन्नो के हर शब्द बयाँ करते हैं
पल वो जो साथ नहीं आज हैं
जीवन एक किताब है....

इसके हर पन्ने पर लिखा
एक नया अध्याय है
कभी शिक्षित बनने का संकल्प
गुरुजी के उपदेश का पल
इसके हर लफ्जों में
वर्णित है जीवन का हर इम्तहान
कुछ कर गुजरने की ललक
मंजिल तय करने का पैमाना
आसमान को छूने की चाह
चंद्रमा को मुट्ठी में 
बंद कर लेने की अभिलाषा
एक-एक लफ्ज में
लिखी संघर्ष की नई कहानी है
इसमें हर कहानी का आगाज़ है
जीवन एक किताब है.....

इसके हर लफ्जों से लरजती
आँखों की करुण पुकार
जिनको कहने से जिह्वा भी
करती है गुरेज
मन की विह्वलता और सांसों की
कमजोरी लिखी है
पन्ने-पन्ने पर अंकित है
सुख की सुबह और गम की रातें
खुशियों से पुलकित हृदय का
हर एक अहसास लिखा है
लाचारी के आँसुओं का
बिन माँगा हिसाब लिखा है
इसके हर पन्ने पर लिखा 
जीवन का हर सोपान है
जीवन एक किताब है....

मालती मिश्रा





Monday, 5 September 2016

शिक्षक दिवस

पूरे साल में एक दिन ऐसा आता है,
जब इस युग का शिक्षक सम्मान पाता है।
व्यवस्था और सिस्टम के हाथों 
बँधे हुए हैं उसके भाव,
शिक्षा कैसे देनी है 
यह तय करना भी नहीं उसके हाथ।
अन्यथा पूरे वर्ष मूक प्राणी की भाँति 
व्यवस्था का  हुकुम बजाता है,
जैसा चाहे जितना चाहे 
वो बस उतना ही पढ़ाता है।
खरीदार बने विद्यार्थी
व्यापारी (विद्यालय संस्थापक) भाव लगाता है,
इन दोनों के बीच में
शिक्षक ही बिक जाता है।
बिके हुए से दास की भाँति 
अधिकार न कोई जताता है,
सम्मान पाना तो दूर की बात
स्वाभिमान भी बचा न पाता है।
औपचारिकता निभाने के लिए ही
इस दिन भीतर का मानव जाग जाता है,
जिसको सदा बस नौकर समझा
वो ही आज शिक्षक नजर आता है।
मालती मिश्रा

Sunday, 4 September 2016

राह तुम्हारी तकते कान्हा......

राह तुम्हारी तकते कान्हा
मैने अपना स्वत्व मिटाया,
काठ सहारा लेते-लेते 
काठ-सी ह्वै गई काया।
नीर बहा-बहा कर दिन-रैना
शुष्क हो गईं अँखियाँ,
तुम बिन सुने कौन मेरी बानी
कासे करूँ मैं बतियाँ।
बिन बोले बिन मुख खोले
शुष्क पड़ गई जिह्वा,
कर्णों का उपयोग नहीं है
प्रकृति का स्पंदन व्यर्थ हुआ।
नीर-समीर को मैं न जानूँ
मेरे तो सब तुम ही हो,
भूख-प्यास और धड़कन साँस
सब अहसास तुम्हीं तो हो।
कानों में चुभती थी मेरे नटवर
जब कोकिल कुहुक सुनाती थी,
विरह की अग्नि जलाती थी जब
वर्षा रिमझिम आती थी।
सूरज की वो मधुर किरणें
बिछोह के तीर चुभाते थे,
फूलों पर भँवरों की गुंजन
तोरी मीठी बतियाँ याद दिलाते थे,
मंद-मंद पुरवा की पवन
हौले से कुछ कह जाती थी,
शीतलता भी उसकी मुझे न भाती
जब तुम्हारी सुगंध न लाती थी।
वसंत की मनभावन सुंदरता
मुझको बड़ा खिझाती थी,
हार-सिंगार किये कोई बाला
अँखियाँ सह न पाती थीं।
बाट जोहन को तुम्हारी कान्हा
मैने सबकुछ छोड़ दिया,
वृक्ष सहारा लेकर मैंने
खुद को उससे जोड़ लिया।
एक झलक को तुम्हरे मधुसूदन
नयना हुए अति भारी,
मेरा संताप मिटाते-मिटाते
मुझसम प्रकृति हुई अब सारी।
मालती मिश्रा

Friday, 2 September 2016

दलित मानसिकता की शिकार राजनीति....

आज कब क्या हो जाय कुछ नहीं कहा जा सकता आज प्रातः मैं घर से बाहर निकल कर गेट बंद कर ही रही थी कि हमारे पड़ोसी अपनी पत्नी के साथ अभी-अभी घर से निकले बाइक मोड़ ही रहे थे कि सामने से आ रहे बाइक  सवार (दो लड़के) ने जो बड़ी ही तेजी से आ रहा था उनकी बाइक के अगले टायर में टक्कर मार दी, खैर पड़ोसी क्योंकि अभी बाइक पर बैठे नहीं थे तो थोड़ा लड़खड़ा कर संभल गए और बोले- थोड़ा देख के भाई ये गली है स्पीड थोड़ी कम कर लो।
"अबे सा* तुझे दिखाई नहीं देता फिर मुझे उपदेश दे रहा है" बाइक सवार जो देखने में ही कोई मवाली सा लग रहा था, मुँह में चबाते हुए मसाले को वहीं (गली में) थूक कर बोला।
"अरे भाई तो तमीज में ही बोल ले मैने तुझसे कोई बदतमीजी की क्या?" पड़ोसी बोले। फिर क्या था वो मवाली सा दिखने वाला लड़का लगा गालियों से उन्हें नवाजने, अब अपने ही घर के सामने कोई किसी बाहर के लड़के से इसप्रकार अपमानित होकर चुप तो नही रह सकता था सो हमारे पड़ोसी भी भड़क गए, गाली-वाली तो नहीं दी पर गिरहबान पकड़ लिया एक जोर का थप्पड़ रसीद करने ही वाले थे कि तभी उनकी पत्नी ने रोक लिया आस-पास के दुकानदारों ने भी बीच-बचाव किया। सामने का पलड़ा भारी पड़ते देख उनमे से दूसरा लड़का कहता है "चल थाने में रिपोर्ट लिखवा देते हैं कि हम दलित हैं इसलिए ये हमें मार रहा है।" वहाँ खड़े सभी स्तब्ध रह गए, किसी ने सोचा भी न होगा कि यहाँ भी दलित कार्ड इस्तेमाल होगा। या फिर ये लोग जानबूझ कर पंगे लेते हैं और फिर दलित-कार्ड आगे करके पब्लिसिटी पाते हैं। खैर जैसे-तैसे लोगों ने समझा-बुझा कर उन दोनों को वहाँ से भेज दिया, वो भी तब तक नहीं टले जब तक उन्हें यह विश्वास नही हो गया कि ऐसा करके स्वयं वो दोनों ही फँसेंगे।

क्या है यह 'दलित'? क्या ऐसा नहीं लगता कि अब यह सिर्फ एक राजनीतिक शब्द बनकर रह गया है? पहले दलित का अर्थ होता था"जो दबाया गया हो, अर्थात् जिसके अधिकारों का हनन हुआ हो" आज दलित का अर्थ है "जो दूसरों को दबाता हो, दूसरों के अधिकारों का हनन करता हो" इस शब्द का प्रयोग भी वही लोग करते हैं जिन्होंने जन्म भले ही दलित या पिछड़े वर्ग में लिया है किंतु वो सामाजिक और आर्थिक रूप से दलित बिल्कुल नहीं होते, वो हर तरह से समृद्ध होते हैं। जो वास्तव में दलित होते हैं जिन्हें सरकार या समाज के सहयोग की सचमुच आवश्यकता होती है उन्हें या तो उनके इस "दलित-कार्ड" की शक्ति का ज्ञान नहीं होता या फिर वो स्वाभिमानी होने के कारण अपने इस अधिकार का प्रयोग नहीं करते। 

अभी 1सितंबर 2016 की ही बात लीजिए दिल्ली में शानदार विजय के साथ सत्तासीन हुई "आम आदमी पार्टी" के "महिला एवं बाल विकास" मंत्री संदीप कुमार।
इन महाशय ने महिलाओं और बच्चों के विकास करने के शपथ के साथ यह पदवी संभाली। और महिलाओं के साथ ऐसे घिनौने कुकृत्य के सामने आने के बाद मीडिया को अपना "दलित-कार्ड" दिखाने में एक सेकेंड का समय नहीं लगाया। "मैं दलित नहीं महा दलित हूँ वाल्मीकि समाज से, मैंने बाबा साहब की प्रतिमा लगवाई इसीलिए लोग मुझे फँसा रहे हैं।"

इन्होंने अपने-आपको बचाने के लिए यहाँ भी दलित होने की घोषणा कर दी। इन्हें कौन समझाए कि राजनीति में आने के बाद, इतना बड़ा और जिम्मेदारी वाला पद संभालने के बाद कोई दलित नहीं रह जाता। बल्कि शोषण तो ये करते रहे हैं महिला विकास के नाम पर महिलाओं का, तो दलित कौन?

या फिर शायद "आम आदमी पार्टी" के नेताओं को व्यभिचार करने के लिए भी आरक्षण चाहिए। अर्थात् यह कुछ भी अनैतिक करें इन्हें दलित मान छोड़ देना चाहिए। 
क्यों समाज में इंसान को इंसान नहीं समझा जाता? क्यों आज हमारे देश में ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया उतने गर्व से यह नहीं कहते कि "हम सवर्ण हैं" जितने गर्व से निम्न तबके के लोग स्वयं को दलित बताते हैं। क्या कारण है कि "दलित" शब्द आज इतना बड़ा बन गया है कि उसके समक्ष बाकी सबकुछ छोटा हो गया है।
आज इस शब्द का ऐसा दुरुपयोग होने लगा है कि इस तबके के लोग बिना किसी परिणाम की चिंता किये अपराध करते हैं और पकड़े जाने पर दलित-कार्ड सामने कर देते हैं।

आज उतने व्यक्ति जन्म या सामाजिक स्थिति के अनुसार दलित नहीं हैं जितने मानसिक रूप से दलित हो गए है, आज समाज की मानसिकता दलित हो चुकी है और इसके लिए "राजनीति" पूर्ण रूप से जिम्मेदार है। जो सचमुच दलित होते हैं, जिन्हें सचमुच सामाजिक  और कानूनी सहयोग की आवश्यकता है, वो उन अधिकारों से वंचित रह जाते हैं और जो 'आम आदमी पार्टी' के नेता संदीप कुमार की तरह सामाजिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते हैं वो अपने अपराधों और व्यभिचारों के सामने आने पर "दलित-कार्ड" का प्रयोग करते हैं।