सोमवार

कानून की दुर्बलता से बलात्कारियों का बढ़ता मनोबल

हमारा देश लोकतांत्रिक देश है यहाँ संविधान को सर्वोपरि रखा जाता है, कानून सबके लिए समान है क्योंकि हम गणतंत्र देश के वासी हैं, यहाँ कानून की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी है ताकि वह पक्षपात न कर सके और सभी को यथोचित न्याय मिल सके। 
परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच सबको निष्पक्ष न्याय मिल पाता है??? इस देश के नागरिक होने के नाते इसके संविधान, इसके कानून का सम्मान करना इसके निर्देेशों का पालन करना हमारा प्रथम कर्तव्य है किंतु दिल मे सम्मान तभी उत्पन्न होता है जब इसमें सभी के लिए समानता दिखाई देती है अन्यथा हम कितना ही क्यों न कहें पर पक्षपात को सम्मान नही दे सकते।
आज से तकरीबन चार साल पहले (१६ दिसम्बर २०१२ को) देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी दुर्दान्त घटना घटित हुई जिसने सिर्फ दिल्ली या इस देश में ही नहीं दूसरे देशों में भी हाहाकार मचा दिया था। इस घटना ने न सिर्फ नैतिकता का हनन किया बल्कि सम्पूर्ण मानवता को शर्मसार कर दिया था। देश का बच्चा-बच्चा इस दुर्दान्त दुर्घटना से वाकिफ है, चलती बस में छः लोगों के द्वारा एक मासूम लड़की का न सिर्फ बलात्कार किया जाता है उसके साथ ऐसी हैवानियत की जाती है कि स्वयं हैवान भी शर्मसार हो जाए। इस घटना से पूरी दिल्ली दहल जाती है हर कोई इस दरिंदगी को जानकर रो पड़ता है, मृत्यु से जूझती निर्भया (मीडिया द्वारा दिया नाम) अपराधियों के पकड़े जाने और उन्हें सजा दिलाने की आस लिए इस जालिम दुनिया से विदा हो गई। अपराधी पकड़े भी गए सबकी निगाहें कानून के फैसले पर टिकी हुई थीं, अपराधियों को दण्ड दिलवाने के लिए न जाने कितने कैंडल-मार्च, आंदोलन आदि भी हुए, फास्ट ट्रैक कोर्ट के लागू होने से एक बार को यह उम्मीद भी जागी कि अब शायद जल्द न्याय होगा......परंतु दुर्भाग्य निर्भया का, दुर्भाग्य उसके माता-पिता का और दुर्भाग्य इस देश का जहाँ ये सभी आज भी इंसाफ के लिए न्यायालय की ओर आशा की मद्धिम होती लौ के साथ टकटकी बाँधे देख रहे हैं।
पर क्या कानून से न्याय पाना इतना आसान है.....

इस वीभत्स दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने पूरे देश को झंझोड़ कर नींद से जगा दिया। 
वो निर्भया जिसका सम्मान वहशियों के द्वारा लूट लिया गया था-
उसको मरणोपरांत २०१२ में ही राष्ट्रपति द्वारा "लक्ष्मीबाई" पुरस्कार से सम्मानित किया गया, 
घटना के बाद ऊषा मेहरा कमीशन का गठन हुआ, जिसमें सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जिम्मेदार विभागों के संवादों की कमी पर तथा संबंधित सुझावों पर रिपोर्टर मांगी गई, 
पहली बार बलात्कार के दोषी को मृत्यु दंड देने का प्रावधान संसद में एक मत से पारित हुआ। 
महिला बाल विकास मंत्रालय ने २४ घंटे हेल्पलाइन नं० शुरू किया।
इस घटना के बाद ही 'राष्ट्रीय महिला आयोग' के लिए "निर्भया भवन" तथा "निर्भया स्मारक कोष" का निर्माण हुआ। 
इतना ही नहीं दिल्ली सरकार द्वारा हेल्पलाइन १८१ शुरू किया गया।
मिनिस्ट्री ऑफ आई टी ने सुरक्षा से जुड़े कई गैजेट बनाने प्रारंभ किए।
निर्भया को २०१३ में अमेरिका द्वारा "इंटरनेशनल वुमेन करेज अवॉर्ड" से सम्मानित किया गया।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट की गाड़ियों में जीपीएस लगने लगे, परंतु इसके बाद भी ऑटो वालों की मनमानी अब भी कायम है।

ये सबकुछ इतनी शीघ्रता से हुआ तो जनता में आशा जागी कि अब निर्भया को शीघ्र ही न्याय मिलेगा। कोर्ट केस के दौरान ही मुख्य आरोपी ने आत्महत्या कर लिया। यह विश्वास और मजबूत हुआ जब फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सुनवाई प्रारंभ हुई और साकेत कोर्ट के द्वारा चार दोषियों को (मृत्युदण्ड) सजा सुनाई गई। परंतु पाँचवा मुजरिम जिसे उसके स्कूल सर्टिफिकेट के आधार पर नाबालिग बताया गया उसे सिर्फ तीन साल के लिए बाल सुधार गृह में रहने की सजा दी गई। यह कैसा इंसाफ था? जाँच के दौरान यह पता चला था कि सबसे अधिक वहशीपन उसने ही दिखाया था तो सिर्फ छः महीने उम्र कम होने से क्या उसका अपराध कम हो गया? जिस इंसान के मन में लेश मात्र भी मानवता नहीं क्या उसे एक और अपराध करने के लिए छोड़ देना न्याय है? निःसंदेह निर्भया की आत्मा फूट-फूटकर रोई होगी। 
इसके अतिरिक्त उन दोषियों को अपील करने की छूट भी जी जाती है और अपील के बाद फिर छः महीने लगे हाईकोर्ट को फैसला सुनाने में लगते हैं। इस बीच अपराधियों ने क्या कुछ नही किया होगा स्वयं को बचाने के लिए।
छः महीने बाद जब हाईकोर्ट सजा बरकरार रखता है तो मुजरिमों को सुप्रीमकोर्ट कोर्ट में अपील की छूट दे दी गई और सुप्रीमकोर्ट ने फाँसी की सजा पर रोक लगा कर उन अपराधियों को न सिर्फ जीने के लिए बल्कि अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए झूठ का मसौदा तैयार करने के लिए कुछ समय और दे दिया। 
चार साल पूरे होने वाले हैं इस दुर्घटना को किन्तु आज तक वो चारों मुजरिम सांस ले रहे हैं। 
क्यों........
क्या यही है कानून की निष्पक्षता.........
क्या यही है न्याय..........
क्या अब भी हमें कानून को पैसे और रसूख वालों का गुलाम नहीं कहना चाहिए?

मुझे आज भी याद है जब मैंने ९ सितंबर २०१३ को 'हिंदुस्तान' मे पेज-९ पर छपी खबर पढ़ी थी जिसमें ७००₹ लूटने के जुर्म में निचली अदालत से सात साल की कैद की सजा पाए एक व्यक्ति की इस सजा को हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस पी गर्ग ने बरकरार रखा। यह घटना १० नवंबर २००९ की थी, जिसमें मात्र आठ महीने में निचली अदालत ने उसे सात साल की कैद की सजा सुनाई थी और हाईकोर्ट में अपील के बाद उसकी सात साल कैद की सजा बरकरार रही। जहाँ तक मुझे पता है पहले बलात्कार जैसे अपराध की सजा भी "सात साल कैद" होती थी, तो क्या हमारे देश का कानून एक स्त्री के मान-सम्मान के हनन उसकी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की कीमत ७००₹ के बराबर मानता है जो दोनों के लूट की सजा बराबर रखी।

मौत से जूझती जिस निर्भया को न्याय दिलाने के लिए पूरा देश एक हो गया था उस निरीह को आज चार सालों के बाद भी न्याय नहीं मिल पाया है। बल्कि अपराधियों को अपने बचाव के लिए कानून के तहत तरह-तरह की सुविधाएँ दी जा रही हैं, सोच कर उस प्रताड़िता पर दया आती है जो न्याय की उम्मीद लिए इस जालिम दुनिया से चली गई। 
उसे तरह-तरह के पुरस्कार, योजनाएँ, स्मारक, हेल्पलाइन नं० आदि की चाह नहीं थी, उसे सिर्फ न्याय (अपराधियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा) की चाह थी ताकि फिर कोई दूसरी निर्भया न पैदा हो।
जिस अपराध का साक्षी उन अपराधियों को पहचानता हो, जिसका अपराध साबित हो चुका हो ऐसे अपराधी को निर्दोष साबित करने का प्रयास करने वाले वकील भी कम अपराधी नहीं होते, क्यों कानून अपराधियों के प्रति ही इतना नर्म रुख अपनाता है? विडंबना तो देखिए जिन वहशियों ने दया के लिए रोती बिलखती गिड़गिड़ाती निर्भया पर दया नहीं किया उनको कानून दयावान होकर इतना अधिकार दे रहा है कि वो न्यायमित्र (संजय हेगड़े और राजू रामचंद्रन) को हटाने की माँग करते हैं। उन्हें इनकी निष्पक्षता पर विश्वास नहीं और कोई इनसे ये नहीं पूछता कि एक अपराधिक मानसिकता वाले व्यक्ति पर कोई क्यों विश्वास करे? 
आज जनता के मनो-मस्तिष्क में यही सवाल है कि क्या फायदा हुआ फास्ट-ट्रैक कोर्ट चलाने का?.....
क्या फायदा हुआ केस की सुनवाई चार के बजाय छः घंटे करने का?.......
क्या भविष्य में भी उन बलात्कारियों की सजा को बरकरार रखने की उम्मीद की जा सकती है?.......

निःसंदेह कानून सर्वोपरि है, परंतु कानून से सदैव न्याय मिलेगा इसकी उम्मीद किन कारणों से की जाय?  यदि दोषी उस सात सौ रूपये के लुटेरे की तरह गरीब और कमजोर है तो कानून उसे जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा देता है और यदि दोषी "याकूब मेमन" जैसा रसूख वालों की सरपरस्ती में जीने वाला पूरे देश का अपराधी हो तो उसे बचाने के लिए यही कानून रात को तीन बजे भी अदालत लगाने को बाध्य हो जाता है। यही कारण है कि अपराधी मानसिकता वाले कानून से नही डरते, बल्कि उनके अनुसार "वो कानून को जेब में लेकर घूमते हैं।" कानून का डर, कानून का सम्मान ये सब सिर्फ गरीबों के लिए है। आज कानून के दाँव-पेंच अपराधियों को सजा देने के लिए नहीं बल्कि उनके रसूख के चलते उनको बचाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। अन्यथा निर्भया के बलात्कारियों को बड़े से बड़े वकील बचाने न आते। सर्वप्रथम होना तो यह चाहिए था कि जिस प्रकार याकूब मेमन के लिए स्पेशल अदालत रात को तीन बजे उसे बचाने के लिए लगाई गई थी उसी प्रकार इन दोषियों के लिए स्पेशल अदालत लगाकर रातों-रात इन्हें फाँसी दे दी जाती ताकि अपराधियों को ये संदेश मिलता कि उनके अपराध अक्षम्य होने पर कानून के दाँव-पेंच उन्हें बचाने में समर्थ न होंगे। परंतु यहाँ तो उल्टा संदेश जाता है।
ऐसे जघन्य अपराध करने वालों की पैरवी करने वाले वकीलों की भी आत्मा मृतप्राय होती है उन्हें भी सिर्फ नोटों की हरी-हरी गड्डी दिखाई देती है, उन्हें एक बार भी यह ख्याल नहीं आता कि यदि उस असहाय लड़की की जगह उनकी अपनी बेटी होती तो क्या तब भी वह इसी प्रकार दोषियों की पैरवी करते? 
यदि वकील इस तरह के केस लड़ना बंद कर दें तो भी अपराधियों के हौसले पस्त होते परंतु यहाँ ऐसा नहीं है, कितना भी बड़ा अपराध करें यदि जेब में पैसा है या ऊँचे पहुँच वालों की सरपरस्ती है तो 95℅ आशा होती है कि वो बच जाएँ, और इसी प्रकार आगे भी अपराध करते रहें। 

नाबालिगों के प्रति कानून के नर्म रुख ने नाबालिगों को अपराध की ओर अग्रसर किया है। 
जब निर्भया के साथ वहशीपन दिखाने वाले नाबालिग को सिलाई मशीन, दस हजार रूपए से सरकार द्वारा ही नवाजा जा रहा है तो क्यों नहीं बड़े-बड़े अपराधी नाबालिगों से ही अपराध कराएँगे?..........और नाबालिग भी तो निडर होकर जुर्म करते हैं पकड़े जाने पर नाबालिग होने का सर्टिफिकेट आगे कर देते हैं और स्वतंत्र हो जाते हैं एक और नए अपराध के लिए।
जबकि होना यह चाहिए कि अपराधी की सजा का मापदंड उसका अपराध होना चाहिए न कि उम्र।
जब एक लड़का जघन्य अपराध करता है वो भी बलात्कार जैसा तो वह प्रमाणित कर चुका होता है कि वह शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व हो चुका है और उसकी मानसिकता विकृत हो चुकी है, ऐसी विकृत मानसिकता वाला व्यक्ति एक स्वस्थ समाज के लिए सिर्फ खतरा हो सकता है इसलिए उसके साथ कोई नरमी बरतना महज अपराध को बढ़ावा देना है। यह हमारे देश के कानून की लचरता का ही परिणाम है कि अपराधी नाबालिग लड़कों को मोहरा बनाकर नित जघन्य अपराध करवाते हैं क्योंकि अपराध करने और करवाने वाला दोनों जानते हैं कि नाबालिग होने के कारण कानून उसे सजा नहीं बल्कि हमदर्दी देगा और परिणाम स्वरूप यही लोग बाद में रेप और मर्डर जैसे जघन्य अपराध करते हैं और २-३ साल में ही नाबालिग होने के नाम पर एक नया अपराध करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं।

हमारे देश का कानून बहुत दयावान है इस बात के लिए विदेशों में इसकी प्रशंसा नहीं होगी बल्कि हमारे देश का कानून निर्भया के बलात्कारियों जैसे खतरनाक अपराधियों को अब तक सजा देने में सफल नही हो पाया, इसकी दुर्बलता पर विदेशों में इसकी निंदा ही होगी। हमारे देश में भले ही लोगों के मनो-मस्तिष्क में इस केस पर समय के धूल की परत जम गई हो परंतु जब हर दिन रेप की नई दुर्घटना की खबर पढने व सुनने को मिलती है तो हर व्यक्ति के मस्तिष्क में यह बात जरूर आती है कि यदि निर्भया के दोषियों को सरेआम फाँसी पर लटकाया गया होता तो आज अपराधी इतने निडर होकर नित नए रेप को अंजाम न दे रहे होते।

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