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Wednesday, 30 December 2015

खामोशी



तुम हो मैं हूँ और हमारे बीच है...गहरी खामोशी
खामोशी..
जो बोलती है
पर तुम सुन नहीं पाते
खामोशी जो शिकवा करती है 
तुमसे तुम्हारी बेरुखी की
पर तुम अंजान बन जाते हो 
खामोशी..
जो रोती है, बिलखती है 
पर तुम देख नहीं पाते 
खामोशी...
जो माँगती है इक मुस्कान 
पर तुम अनभिज्ञ अंजान
न पाए इसकी सूनी आँखों को पहचान 
खामोशी...
जो हँसती है अपनी बेबसी पर 
पर ठहाकों में छिपा दर्द तुम्हें छू न सका
खामोशी...
जो चीखती है, चिल्लाती है 
अपना संताप बताती है 
पर तुम हो बेखबर 
खामोशी..
जो खोजती है तुम्हारी नजरों को 
खामोशी...
जो सुनती है तुम्हारी सांसों की धुन को
खामोशी....
जो पढ़ती है तुम्हारी आँखों को 
खामोशी....
जो कहती है, सुनती है, 
देखती,पढ़ती और समझती है
पर कुछ भी बताने में झिझकती है...
वही खामोशी..
फैली है आज चारों ओर
जिसका कोई ओर न छोर 

साभार...मालती मिश्रा

Tuesday, 29 December 2015

तन्हाई.....


तन्हाई की गहराई तक
पाया खुद को तन्हा मैंने...
चलोगे तुम साथ मेरे
थाम हाथों में हाथ मेरे...
देखा था ये सपना मैंने|
पर सपना था वो....सिर्फ सपना
होता है ये कब किसी का अपना?
कुछ पल का जीवन दे जाता है 
अकेलेपन से दामन छुड़ा जाता है 
पर जब टूटता है.....
तो तन्हाई की इन्तहाँ तक 
अकेलेपन के अथाह सागर में 
डूबने के लिए....
अकेला छोड़ जाता है 
तन्हाई की गहराई में 
फिर......
पाया खुद को तन्हा मैंने...

साभार....मालती मिश्रा

Sunday, 20 December 2015

बढ़ती सुविधाएँ.....घटते संस्कार


आज दुनिया ने विकास के नये-नये आयाम हासिल कर लिए हैं मनुष्य ने अपनी बुद्धि, अपनी सूझ-बूझ से विकास की ऊँचाइयों को छू लिया है, मनुष्य ने तकनीकी विकास के द्वारा सुख-सुविधाओं के उन साधनों का आविष्कार किया है जिनके विषय में पहले व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था, आज व्यक्ति विकास की उस ऊँचाई पर है जहाँ पर पहुँचने की कल्पना भी पहले का मानव नहीं कर सकता था....हालांकि आविष्कार का आरंभ तो 'आग' के आविष्कार के साथ ही प्रारंभ हो चुका था किंतु यह आविष्कार मनुष्य को इतना आगे ले आएगी ये किसी ने सोचा भी न होगा....

जो दूरी व्यक्ति पहले महीनों में पैदल चलकर तय करता था आज वही दूरी चंद घंटों मे तय कर लेता है, पहले व्यक्ति अपने करीबी लोगों को समाचार प्रेषित करने के लिए पक्षियों का फिर राहगीरों का और फिर डाक का सहारा लेने लगा, इन सभी तरीकों में समय अधिक लगता था परंतु अब मोबाइल के आविष्कार ने न सिर्फ यह समस्या हल कर दिया बल्कि क्षण भर में ही समाचार प्राप्त होने के साथ-साथ वीडियो कॉल के जरिए व्यक्ति विशेष से आमने-सामने बात भी हो जाती है...किंतु इन तकनीकी साधनों के द्वारा जहाँ दूरियाँ घटी हैं वहीं व्यक्ति के दिलों में दूरियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि उन्हें तय कर पाना लगभग असंभव होता जा रहा है...जहाँ एक स्थान से दूसरे स्थान, एक शहर से दूसरे शहर और एक देश से दूसरे देश तक जाने आने में बहुत कम समय लगता है वहीं अब एक ही घर में रह रहे व्यक्तियों के पास भी एक-दूसरे से बात करने का भी समय नहीं होता, दो-चार कदम की दूरी पर रह रहे अपने रिश्तेदारों,मित्रों से भी महीनों नही मिल पाते.....जबकि इन तकनीकी सुविधाओं के आविष्कार से पहले व्यक्ति दूर होते हुए भी दिल के इतने करीब होते थे कि मिलने का समय निकाल ही लेते थे चाहे फिर कोसों दूर पैदल चलकर जाना पड़ता था, दूर रहने वाले रिश्तेदारों के बारे में समाचार पूछने हेतु दूर-दूर तक चले जाया करते थे |

आज के समय में तकनीकी साधनों ने स्थानों की दूरियाँ जितनी कम की हैं दिलों की दूरियाँ उससे अधिक बढ़ा दी हैं, रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है, संस्कारों के मापदंड बदलने लगे हैं, स्वार्थांधता लोगों पर हावी होती जा रही है,रिश्तों को देखने का नजरिया बदलने लगा है,उनके प्रति सम्मान तथा जिम्मेदारी का भाव समाप्त हो रहा है| 

माता-पिता बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर मोबाइल दिलवाते हैं ताकि जब बच्चा घर से बाहर हो तो वह उनके संपर्क में रहे किंतु बच्चों ने मोबाइल को ही अपना सब कुछ बना लिया है, वह घर से बाहर रहकर तो माता-पिता के संपर्क में रहते हैं किंतु घर पर आने के बाद माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्यों से उनका संपर्क लगभग टूट-सा जाता है... अलग-थलग कमरे में बैठकर सोशल साइट्स पर अनजाने मित्रों से चैटिंग करते हैं किंतु घर के ही दूसरे कमरे में माता-पिता को उनकी जरूरत होगी इस बात का अहसास भी नहीं होता....फेसबुक पर अनजाने मित्रों की फोटो देखकर उसपर कमेंट देना कभी नहीं भूलते परंतु माँ ने प्यार से पकाकर जो खिलाया उसके विषय में कुछ कहना चाहिए ये पता ही नहीं होता....देर रात तक मोबाइल पर गेम खेलने, चैटिंग करने के लिए जागते है परंतु बहन या छोटे भाई की पढ़ाई में एक घंटे की मदद देने को तैयार नहीं....आजकल की नई पीढ़ी फेसबुक पर बुजुर्गों की तस्वीरें देखकर उनपर दया दर्शाते तथा बड़े बुजुर्ग की सेवा व सम्मान पर कमेंट तो करते हैं पर अपने माता-पिता व दादा-दादी के लिए सोचने का समय भी उनके पास नहीं होता..
मदर्स-डे पर बड़े-बड़े आदर्शों की बातें करके ही वो माँ के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर लेते हैं....बढ़ते तकनीकी ज्ञान ने आज की पीढ़ी में निःसंदेह ज्ञान का सर्जन किया है, समय की बचत किया है, कार्यों को आसान किया है, इसने देशों के बीच की दूरी को समाप्त करके दुनिया को एक साथ जोड़ने का भी कार्य किया है किंतु इतने सारे महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणामों के बाद एक नकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगा है वो है रिश्तों के बीच दूरी, आपसी जुड़ाव का अभाव, भावनाओं की समाप्ति, आदर्शों का क्षय, जिम्मेदारी के अहसास की समाप्ति, कुल मिलाकर तकनीकी ज्ञान और तकनीकी सुविधाएँ हमें सभ्य तो बना रही हैं किंतु संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं और संस्कार विहीन समाज सम्पन्न और प्रसन्न दिखाई तो पड़ता है परंतु प्रसन्न होता नहीं...अपने मूल्यों से जुदा होकर कभी कोई प्रसन्न नहीं होता.....

साभार......मालती मिश्रा

Monday, 14 December 2015

मैं फेल हो गई......एक सोच


बैठे-बैठे यूँ ही मेरे मन में 
आज अचानक ये विचार आए 
अपने जीवन के पन्नों को 
क्यों न फिर से पढ़ा जाए 
अतीत में छिपी यादों की परत पर 
पड़ी धूल जो हटाने लगी 
अपने जीवन के पन्नों को 
एक-एक कर पलटने लगी 
जब मैं छोटी सी गुड़िया थी
माँ की आँखों का तारा  थी
बाबा की राजदुलारी थी
उनको जान से प्यारी थी 
माँ के सारे अरमान थी मैं 
बाबा का अभिमान थी मैं 
संकुचित विचारों के उस छोटे गाँव में 
लोगों की सोच भी छोटी थी 
शिक्षा पर बेटों का हक था
बेटियाँ अशिक्षित ही होती थीं
संकुचित विचारधारा को तोड़कर 
बाबा ने मुझे पढ़ाया था 
बाबा का मान बढ़ाऊँगी
मैंने ये स्वप्न सजाया था 
अकस्मात् जीवन में मेरे 
नया एक आयाम आया 
माँ-बाबा से इतर मेरे जीवन में
किसी और ने भी अपना स्थान बनाया 
जीवन की प्राथमिकता बदली 
स्वार्थ का बीज अंकुरित हो गया
माँ-बाबा के सम्मान से बढ़कर
अपनी खुशियों का नशा चढ़ गया 
माँ-बाबा का मान बढ़ाने का 
उनके स्वप्न सजाने का 
ख्याल न जाने कहाँ खो गया 
लक्ष्य कुछ करके दिखाने का
अपने गाँव की तंग सोच को
विकास के पंख लगाने का
वो ख्वाब न जाने कहाँ सो गया 
नियति अपना खेल खेल गई
उस दिन ये बेटी फेल हो गई....
माँ-बाबा मैं फेल हो गई....
भाई-बहन का रिश्ता प्यारा था
इस जग से अलग वो न्यारा था
उनका तो विश्वास थी
सबसे अलग कुछ खास थी
उनके विश्वास से भी खेल गई
एक बहन फेल हो गई....
रूखा-सूखा खाकर भी
सम्मान को सदा ऊँचा रखना
कैसा भी संकट आए
स्वाभिमान नहीं जाने देना
बाबा से यही सीखा था मैंने 
बाबा को आदर्श मान
पति में उन्हीं गुणों को तलाशा
गुण तो मिले न एक भी
उम्मीदें टूटीं मिली निराशा 
हालातों से समझौता करना 
यही एक विकल्प बचा 
करके समझौता हालातों से 
निराशा को भी गई पचा 
पर सहा न गया मुझसे आघात 
स्वाभिमान को खंडित करके 
छलनी किए मेरे जज्बात 
पति-पत्नी में विश्वास रहा न
ये रिश्ता मैं न झेल पाई
एक पत्नी मुझमें फेल हुई 
मेरे बच्चे मेरी जान
जिनपर करती मैं अभिमान
लुटा दिया उनपर सारा जहान
उनको लेकर हर पल मेरे
सपने भरते रहे उड़ान 
आज वो बच्चे बड़े हो गए
अपनी दुनिया में ही खो गए
मेरे आदर्श मेरे उसूल
उनको लगने लगे फिजूल 
अपनी परछाईं में मैं 
अपनी छवि न समा पाई 
स्वाभिमान की शय्या पर 
मेरे आदर्शों की मृत्यु हुई
एक माँ भी देखो फेल हुई.....
हाँ कहने में भले ही देर हुई 
पर सच है...
हर रिश्ते में मैं फेल हुई.....

साभार.....मालती मिश्रा

Friday, 11 December 2015

मुखौटा...


आँखें नम हैं, दिल में गम है 
छिपाए फिरते हैं दुनिया से 
चिपका कर होंठों पे झूठी मुस्कान 
दिल में लिए फिरते हैं दर्द का तूफान 
पहन मुखौटा मान-सम्मान का
करते सुरक्षा झूठे अभिमान का
भीतर से टूटे-बिखरे पड़े हैं
फिर भी प्रत्यक्ष में अकड़े खड़े हैं
डर है निर्बलता मेरी जाने न कोई
मेरे अंतस के भय को पहचाने न कोई
देखकर लोगों हरपल ठहाके लगाते
न जाना पाई कभी वो भी हैं आँसू छिपाते 
दर्द का सौदा ही मुझको करना पड़ा है
खुशियों का भाव अाजकल आसमान पे चढ़ा है..

साभार....मालती मिश्रा

Friday, 4 December 2015

बाबूजी ने सुनाई कहानी-'एक तो देखी घर की नार'


   सभा समाप्त हुई, राजा साहब लुटेरों को ढूँढ़ने का आदेश देकर दरबार से प्रस्थान कर चुके थे, सभी मंत्रियों, दरबारियों में बुदबुदाहट शुरू हो गई थी..
कोई कह रहा था कि जरूर कोई भीतर का ही होगा अन्यथा इतनी बड़ी चोरी को अन्जाम देना असंभव है तो दूसरा कहता नही इतना साहस किसी में नहीं कि वो इस कदर विश्वासघात करे, जरूर कोई शातिर अनुभवी लुटेरा होगा......
माधव ये सब बड़े ध्यान से सुन रहा था वो दरबार में सभा शुरू होने से पहले ही आ गया था, वो समय पर पहुँचकर यहाँ के राजा को एक महत्वपूर्ण सूचना देना चाहता था...सभा शुरू हुई..महामंत्री ने राजा को नगर में हुई बहुत बड़ी चोरी की सूचना दी, सभी इस समस्या पर विचार-विमर्श करते रहे...एक कोने में खड़ा माधव इस इंतजार में था कि कोई उससे पूछे तो वो सब सच्चाई बताकर चोर को पकड़वाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे...परंतु उससे कुछ पूछना तो दूर किसी ने उसकी ओर देखा तक नहीं| जब सभा समाप्ति की घोषणा करके राजा चले गए तो मायूस हेकर माधव बड़बड़ाते हुए जाने लगा......
इक तो देखी घर की नारी,
थूक-फज़ीहत लातन से मारी,
दूजा देखा फुक्कन वीर
गठरी ले गयो नदी के तीर,
तीजा देखा जटाधारी,
लूट शहर आसन-धारी,
चौथा देखा राज-दरबार,
कोई न पूछे बात हमार |
स्वयं से ही बुदबुदाते हुए माधव राज दरबार से बाहर की ओर जाने लगा....किंतु उसकी बातें किसी मंत्री के कानों को सचेत कर चुकी थीं, उस मंत्री की कठोर आवाज आई....रुको, माधव के पैर ज्यों के त्यों रुक गए....कौन हो तुम? पहले कभी तो नही देखा, कहाँ से आए हो?
मंत्री ने एक साथ कई प्रश्न पूछ डाले, उसके स्वयं के चेहरे पर भी कई सवालिया निशान साफ दृष्टिगोचर हो रहे थे|
साहब जी मैं माधव हूँ, यहाँ से बहुत दूर एक छोटे से गाँव टीकमपुरा से आया हूँ |
तुम अभी क्या बोल रहे थे? मंत्री ने पूछा
साहब मैं कह रहा था- इक तो देखी........
माधव ने वही लाइनें ज्यों की त्यों दुहरा दीं
म्मैं समझा नहीं तुम्हारी इस पहेली का मतलब, सीधे-सीधे समझाओ नहीं तो कैद कर लिए जाओगे....मंत्री ने धमकाते हुए कहा
माधव बोला- मंत्री जी मेरी इस पहेली को समझने के लिए आपको मेरी पूरी आपबीती सुननी पड़ेगी |
क्या ये आवश्यक है? मंत्री बोला
मेरे लिए न सही परंतु आपके लिए आवश्यक है...माधव ने जवाब दिया
वो कैसे? मंत्री ने पूछा
वो तो पूरी बात सुनकर ही जान पाएँगे...माधव ने कहा
ठीक है सुनाओ...कहकर मंत्री कुछ अन्य मंत्रियों के साथ वहीं दरबार में बैठ गया, माधव ने बताना शुरू किया......

शाम का समय था दिन भर के अनवरत सफर से थककर सूर्य देव भी विश्राम हेतु अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर चुके थे, रात अपना स्याह आँचल धीरे-धीरे फैलाने लगी थी,तेजी से उड़ते पंछियों के झुंड अपने-अपने नीड़ की ओर पहुँचने की जल्दी में प्रतीत हो रहे थे किंतु सुबह का निकला माधव अबतक घर वापस नही आया, कमली हल्की सी आहट पाकर दरवाजे की ओर देखती किंतु माधव को न पाकर निराश हो जाती, कमली पानी पिला दो,बहुत प्यास लगी है...अचानक माधव की आवाज सुनकर कमली पीछे मुड़ी....माधव बाहर पड़ी खाट पर बैठते हुए बोला|
बड़े थके हुए लग रहे हो लगता है कई दिनों की मजदूरी एक ही दिन में कर आए हो...पानी का लोटा माधव की ओर बढ़ाते हुए कमली ने कहा,
कहाँ पगली, सुबह से सिर्फ ये दो जून की रोटी का इंतजाम हुआ है....कहते हुए माधव ने अनाज की छोटी सी पोटली अपनी पत्नी की ओर बढ़ा दी,
खुशी से दमकते कमली के चेहरे पर एकाएक उदासी के बादल घिर आए जिसे माधव ने भी महसूस किया...
कमली, मैं सोच रहा हूँ मैं कुछ दिनों के लिए शहर चला जाऊँ, कुछ पैसे कमा लूँगा फिर यहाँ आकर छोटा-मोटा धंधा शुरू कर दूँगा...माधव ने कहा
पर जाओगे कैसे, हमारे पास तो थोड़ा-बहुत भी कुछ नहीं है राह में क्या खाओगे? कमली ने कहा,
तुम चिंता न करो मैं इंतजाम कर लूँगा...माधव बोला
सुबह होते ही माधव शहर जाने के लिए तैयार होने लगा, पड़ोस में रह रहे भाई से कुछ रूपए उधार ले आया, उनमें से कुछ कमली को दे दए और बचे हुए रूपए स्वयं के लिए रख लिए... कमली ने उसके कपड़े एक पोटली मे बाँध दिए और रास्ते में खाने के लिए रोटी-अचार,कुछ चबैना पोटली में रख दिया और उदास होकर माधव से बोली-तुम्हारे जाने के बाद मैं कैसे रहूँगी? 
मैं जल्द ही वापस आ जाऊँगा, बस एक-दो महीने की बात है तब तक भइया और उनका परिवार है न वो तुम्हें कोई परेशानी न होने देंगे...कह कर माधव ने विदा ली|

चलते-चलते एक प्रहर बीत गया माधव भी थक गया था, वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर आराम करने लगा, उसकी सोच ने करवट बदली मेरी पत्नी क्या कर रही होगी, बेचारी कितनी उदास होगी कोई आश्चर्य नहीं कि वो रो रही हो...हे भगवान ये मैंने क्या कर दिया, इतना प्रेम करने वाली अपनी पत्नी को अकेली छोड़कर आ गया....वो तो मेरे बगैर खाना भी नही खाएगी, यदि ऐसा हुआ तो बीमार पड़ जाएगी, नहीं-नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूँगा मैं उसे भी साथ ले जाऊँगा....सोचते हुए माधव जल्दी से उठा और वापस गाँव की ओर चल दिया | कमली मुझे देखकर कितनी खुश होगी और जब मैं उसे साथ ले जाने की बात बताऊँगा तब तो खुशी से पागल ही हो जाएगी...सोचते हुए माधव के पैर दोगुना तेजी से घर की ओर बढ़ रहे थे....घर पहुँचते-पहुँचते दो प्रहर बीत चुके थे,घर के भीतर जाने से पूर्व माधव के मन में जिज्ञासा हुई ये जानने की कि कमली क्या कर रही है? उसने खिड़की के पट को हल्के से सरकाया और दरार में से झाँका तो वो स्तब्ध रह गया.... कमली उसकी फोटो के टुकड़े-टुकड़े कर रही थी फिर उन टुकड़ों पर उसने थूक दिया और लात से मारते हुए बोली-तुझे याद करे मेरी जूती, जब से इस घर में आई हूँ तूने सिवाय कंगाली के दिया ही क्या है? अब मैं अपने माँ-बाप के घर आराम से रहूँगी....तेरे रहते तो वहाँ भी नहीं रह सकती थी | 
माधव का हृदय छलनी-छलनी हो गया....वो दबे कदमों से वापस मुड़ा और फिर चल दिया शहर की ओर....किंतु इस बार मन में उत्साह नहीं था कुछ कर गुजरने का जुनून नहीं था.....निराशा और हताशा उसकी चाल में साफ दिखाई दे रही थी |

चलते-चलते शाम हो गई, सूर्यास्त हो रहा था, अँधेरा अपना दामन पसारने लगा था...माधव को शौच जाने की आवश्यकता महसूस हुई. वो इधर-उधर देखने लगा...पास ही नदी बह रही थी, दूर-दूर तक खेत नजर आ रहे थे...शाम के धुंधलके में एक साया माधव को अपनी ओर आता हुआ प्रतीत हो रहा था, धीरे-धीरे वो साया करीब आ गया....वो माधव की ही तरह एक राही था | दोनों ने एक-दूसरे का परिचय प्राप्त किया..उसने माधव को अपना नाम फुक्कन वीर बताया| शीघ्र ही दोनों मे दोस्ती हो गई...माधव शौच के लिए खेतों में चला गया और अपनी पोटली वहीं नदी के किनारे फुक्कन वीर की देख-रेख में छोड़ गया|
कुछ देर के बाद माधव उसी स्थान पर वापस आया तो फुक्कन वीर को वहाँ न पाकर पुकारने लगा- फुक्कन वीर कहाँ हो मित्र?
किंतु कई बार पुकारने के बाद भी जब कोई उत्तर नही मिला तो घबरा कर इधर-उधर ढूँढ़ने लगा.. परंतु उसे फुक्कन वीर कहीं न मिला वह समझ गया कि वह उसकी पोटली लेकर भाग गया | माधव बहुत दुखी हुआ, उसकी पोटली में ही उसके कपड़े, खाने का कुछ सामान और भाई से लिए गए पैसे रखे थे, अब उसके पास कुछ भी नही था वो पापस घर भी नहीं जा सकता था.... दुखी होकर वह वहीं बैठ गया, क्या करे क्या न करे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, दिन छिप चुका था, वह उठा और दिशा हीन सा एक ओर चल दिया कुछ देर चलने के उपरांत वह एक बगीचे में पहुँचा...रात बहुत हो चुकी थी भूख के मारे उसके पेट में चूहे दौड़ रहे थे, खाने को तो कुछ था नही, रात बिताने के लिए उसे यह स्थान उचित लगा... रात के अँधेरे में उसे कुछ दूरी पर एक कुटिया दिखाई दी, वह आश्रय की उम्मीद में उधर चल दिया, कुटिया के सामने कुछ दूरी पर ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ थीं जिनमें यदि व्यक्ति छिपना चाहे तो बैठकर आसानी से छिप सकता था....माधव झाड़ियों के पास पहुँचा तभी कुटिया में कुछ हलचल सुनाई दी, माधव के पैर ठिठक गए...उसने काले वस्त्रों मे कुछ लेगों को बाहर आते देखा तो झट से झाड़ियों के पीछे छिप गया....ये लोग उसे ठीक नहीं लग रहे थे..उनमें से एक बोला-सरदार आज किसको शिकार बनाने का इरादा है? 
शहर के साहूकार को..उनका सरदार बोला, और इसप्रकार बातें करते हुए वो लोग वहाँ से चले गए | 
माधव किंकर्तव्यविमूढ़ सा उन लोगों को देखता रहा, वो लोग आठ थे...माधव समझ चुका था कि वो चोर-लुटेरों की कुटिया में आ गया है वो वहाँ से भागना चाहता था किंतु अर्धरात्रि के अँधेरे में वो कहाँ जाए, अभी इन्हीं झाड़ियों में पड़ा रहता हूँ सवेरे सूर्योदय से पहले ही चला जाऊँगा ऐसा सोचकर माधव वहीं झाड़ी के पीछे लेट गया और उसकी आँख लग गई....
अचानक किसी की आहट से माधव की निद्रा भंग हुई..शायद कोई उसके बिल्कुल पास से गुजरा था, वह सावधानी पूर्वक उठा और देखा तो वही काले वस्त्रधारी लुटेरे वापस आ चुके थे, उनके हाथों में गठरियाँ थीं...सरदार आज तो बहुत माल हाथ लगा है, उनमें से एक बोला
हाँ अब तुम लोग शीघ्रता से नीचे जाओ रात का अंतिम प्रहर समाप्त होने वाला है, कुछ ही देर बाद लोगों का आवागमन आरंभ हो जाएगा' कहते हुए सरदार ने एक पोटली से निकालकर जल्दी-जल्दी गेरुए वस्त्र पहने और जटाओं का नकली विग लगाया, वहीं पर बिछे आसन को हटाया और उस तख्त को हटाया जिस पर आसन बिछा था, सभी लुटेरे एक-एक करके वहाँ से नीचे उतरने लगे शायद वहाँ सीढ़ीनुमा कोई मार्ग होगा जो माधव को दिखाई नहीं दे रहा था, सभी लुटेरों के नीचे जाते ही उस साधु बने लुटेरे ने तख्त यथास्थान रखा और उस पर आसन बिछाकर ध्यान लगाने की मुद्रा में उस पर बैठ गया....यह सब देख माधव स्तब्ध हो गया, रात्रि का अँधेरा अभी भी गहराया हुआ था किंतु उसने अनुमान लगाया कि अब शीघ्र ही सवेरा होने वाला है, वह झाड़ियों के पीछे झुके हुए धीरे-धीरे वहाँ से खिसकने लगा और कुछ ही क्षणों में कुटिया से इतनी दूरी पर था कि सुरक्षित वहाँ से जा सके| उसने साधु बने लुटेरे को पकड़वाने का निश्चय किया और मार्गों पर लगे दिशानिर्देश का अवलोकन करते हुए राजमहल की ओर बढ़ने लगा....वहाँ पहुँचते-पहुँचते सूर्योदय हो चुका था, माधव द्वार पर खड़े द्वारपाल से विनती करके भीतर गया.... 

रात्रि की लूट की खबर सिपाहियों को हो चुकी थी जिसके कारण चारों ओर कुछ अधिक ही हलचल थी, शायद आज दरबार की कार्यवाही रोज की तुलना में अधिक शीघ्र शुरू हो रही थी....महाराज के आने की उद्घोषणा के साथ ही सभी सतर्क हो गए...माधव चुपचाप एक कोने में खड़ा हो गया, उसे लगा कि राजा जी सभी से लूट के विषय में पूछेंगे तो वह उन्हें बता देगा परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ.... माधव ने अपनी पूरी आपबीती मंत्री को सुना दिया
हमें ये तो समझ आ गया कि तुम लुटेरों को जानते हो, हम तुम्हारे साथ चलकर उन्हें पकड़ लेंगे परंतु तुम्हारी पहेली का अर्थ समझ नही आया...एक मंत्री ने कहा,
मंत्री जी मैंने कहा था-"एक तो देखी घर की नारी"
"थूक फजीहत लातन से मारी" मतलब मैंने पहले अपनी पत्नी को देखा जो मेरे फोटो पर थूक कर फजीहत करके लात मार रही थी, और फिर मैने कहा-"दूजा देखा फुक्कन वीर गठरी ले गयो नदी के तीर"
मतलब मैंने दूसरा फुक्कन वीर ठग को देखा जो चोरी से मेरी गठरी नदी के किनारे से ले गया, उसके बाद मैंने कहा-"तीजा देखा जटाधारी लूट शहर आसन धारी" अर्थात् मैने तीसरा एक जटाधारी साधु देखा जिसने शहर को लूटकर इस प्रकार आसन ग्रहण कर लिया कि कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि वो कोई लुटेरा है, फिर मैंने कहा-"चौथा देखा राज-दरबार कोई न पूछे बात हमार" अर्थात् मैंने चौथा ये राज-दरबार देखा जहाँ किसी ने भी मेरी बात नहीं पूछी |

सभी मंत्री प्रशंसा भरी नजरों से माधव को देख रहे थे, माधव मन-ही-मन गर्व का अनुभव कर रहा था....मंत्री सिपाहियों को लेकर माधव के साथ उसी कुटिया पर पहुँचे जहाँ साधु बैठकर माला जप रहा था....सिपाहियों के साथ मंत्री जी को देखकर वह बोला-आओ पुत्र इस सन्यासी की कुटिया में तुम्हारा स्वागत है, कहो कैसे आना हुआ?
साधु महाराज रात में शहर में बहुत बड़ी चोरी हुई है, हम उन्हीं चोरों को ढूँढ़ रहे हैं...मंत्री जी ने कहा,
ये तो सन्यासी की कुटिया है पुत्र, हम तो मोह माया से कोसों दूर हैं, तुम्हें कहीं और जाकर ढूँढ़ना चाहिए...साधु ने कहा
नहीं महाराज हमारा मन कहता है कि हमें चोर और चोरी का सामान दोनों यहीं मिल जाएँगे, कहते हुए मंत्री ने साधु की दाढ़ी पकड़कर खींचा किंतु ये क्या दाढ़ी तो मंत्री जी के हाथ में ही रह गई.....साधु बना बहरूपिया भागने को तत्पर हुआ तभी दूसरे सिपाही ने उसे पकड़ लिया और अन्य सिपाहियों ने तहखाने में जाकर बाकी के चोरों समेत लूट का माल बरामद कर लिया |
राजा ने माधव को पुरस्कार-स्वरूप बहुत-सा धन दिया, माधव प्रसन्न होकर अपने गाँव वापस चल दिया.....

साभार.....मालती मिश्रा 

Saturday, 28 November 2015

दर्द से रिश्ता


क्यों भागते हैं लोग खुशियों के पीछे
खुशियाँ तो हैं छलावा,
छिपा कर दर्द दिल में
करते हैं सब दिखावा
चिपका कर होठों पर झूठी मुस्कान
लिए फिरते हैं दिल में दर्दोंं का तूफान
फिर भी खुशियों को ही मानके
अपना सच्चा हमसफर,
दुखों से छुड़ाते रहते दामन
दर्द कहता सच्चा दोस्त हूँ मैं तेरा
कर मुझ पर ऐतबार ऐ इंसान....
खुशियाँ आएँगीं.....
झलक दिखलाकर चली जाएँगीं,
मैं सदा रहूँगा साथ तेरे
तू जोड़कर रिश्ता अपना...
मुझसे सच्चे दिल से
फिर देख दर्द में भी कैसे....
मुस्कुराता है तू ,
पाएगा हमेशा साथ मुझे....
कभी तन्हा खुद को पाएगा न तू 

साभार....मालती मिश्रा

Wednesday, 18 November 2015

किस ओर जा रहा देश मेरा......


किस ओर जा रहा देश ये मेरा.....

जिसने दिया शून्य का ज्ञान
जिसपर करते थे हम मान
जो कहलाया विश्व गुरू
विज्ञान का जहाँ से जन्म शुरू
सत्ता के लोभी जीवों ने 
डाला इस पर डेरा...
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

कालिदास, पाणिनी से विद्वान
आर्यभट्ट, चाणक्य महान
इस धरती पर ले जन्म जिन्होंने
ज्ञान से बढ़ाया इसका मान
गंगा-जमुना, सतलुज की धारा ने
जिसका पाँव पखेरा..
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

गाँधी, बुद्ध की ये धरती
जिसे पाने को दुनिया मरती
सम्राट अशोक जिसका सिर-मौर्य
गाता विश्व जिसकी संस्कृति का शौर्य
देश विरोधी जयचंदों ने
आज है उसको घेरा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा....

अपनी सुसंस्कृति की खातिर
पूजा गया सदा जो देश
उसी संस्कृति का पालन आज
पैदा करने लगा है क्लेश
पाश्चात्य आडंबरों ने आकर 
मान्यताओं को है बिखेरा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

पूजी जाती थी जो नारी
लगती है आज वही भारी
जन्म से पहले मार दिया
जन्मी तो दुत्कार दिया
नारी की अवमानना में किसी ने 
कोई कसर न छोड़ा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

जिस देश की धरती शस्य श्यामला
पेट भरे बिन पूछे धर्म
आज उसी के चंद सपूत
भरें तिजोरी किए बिन कर्म
बाधा बने जो इनकी राहों का
असहिष्णु बता उसे ही घेरा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा....
किस ओर....

साभार....मालती मिश्रा

Thursday, 12 November 2015



चहुँ ओर रहे प्रकाश का बसेरा
हर पल बना रहे खुशियों का सवेरा

ढूँढ़ते रह जाओगे



ईमानदारी की बातें 
सुकून भरी रातें
मानवता की सौगातें
ढूँढ़ते रह जाओगे

गिरते हुए दाम
दफ्तरों में काम 
जगत् गुरु का नाम
ढूँढ़ते रह जाओगे

सस्ती शिक्षा
मुफ्त में गुरु की दीक्षा
निस्वार्थ समीक्षा
ढूँढ़ते रह जाओगे

नेताओं में देशभक्ति
लेखकों की लेखनी की शक्ति
साधु-संतों में ईश भक्ति
ढूँढ़ते रह जाओगे

स्कूलों में पढ़ाई
बस अड्डों पर सफाई
ईमानदारी की कमाई
ढूँढ़ते रह जाओगे 

बड़ों का सम्मान
अपनी मातृभाषा पर अभिमान 
गरीबों को दान
ढूँढ़ते रह जाओगे

परोपकार की साधना
इंसानियत की भावना
दूसरों के दुखों को बाँटना
ढूँढ़ते रह जाओगे

भारतीय संस्कृति का मान
हिन्दी की शान
देशभक्ति का दिल से गान
ढूँढ़ते रह जाओगे

जनता का निस्वार्थ वोट
नेता बिन खोट 
बुराई पर अच्छाई की चोट 
ढूँढ़ते रह जाओगे 

कर्णप्रिय संगीत 
भाव प्रधान गीत
गरीबों का सच्चा मीत
ढूँढ़ते रह जाओगे 

साभार......मालती मिश्रा

Wednesday, 4 November 2015


यह सत्य सनातन है कि अच्छाई को बार-बार परीक्षा के मार्ग से गुजरना पड़ता है किंतु यह भी सत्य है कि बार-बार आग में तपने के बाद सोना कुंदन बन जाता है | जब सतयुग में भी सत्य को परीक्षा के दुर्गम मार्गों पर चलना पड़ता था तो यह तो कलयुग है फिर आज यदि हम सिर्फ यह सोचकर कि "जीत तो सत्य की ही होगी" निष्क्रिय होकर बैठ जाएँ तो इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्य को हार का मुँह देखना पड़े...गलत नहीं कहा गया कि "इक दिन ऐसा कलयुग आएगा, हंस चुगेगा दाना-दुनका कौवा मोती खाएगा" आज यही सत्य चहुँओर व्याप्त है, आखिर समय की मार से न कोई बचा है न बचेगा फिरभी समय का फेर समझकर अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए...एकबार फिर जो परीक्षा की अग्नि में तपकर निखरे वही कुंदन...
शुभरात्रि
साभार.....मालती मिश्रा

Tuesday, 3 November 2015

                                     

अपने ही देश मे गर पाना है सम्मान 
छोड़-छाड़कर धर्म अपना सब बन जाओ खान
शाकाहारी भोजन करना मानवता का अपमान
गौ माता का वध करना घर्मनिरपेक्षता का प्रमाण
अपमान का हलाहल विष चुपचाप पी जा नादान
चोटें खाकर भी घातक का सदा बढ़ाता जा तू मान
छोड़-छाड़कर धर्म अपना सब बन जाओ खान



Sunday, 1 November 2015

वापसी की ओर


गाड़ी धीरे-धीरे सरकती हुई प्लेटफॉर्म पर रुक गई, एक हाथ में अटैची और दूसरे हाथ से बैग को कंधे पर लटकाते हुए उसने गाड़ी से नीचे प्लेटफार्म पर पैर रखा ही था कि बाबूजी कुली..एक बूढ़े से व्यक्ति ने पास आते हुए पूछा, वह व्यक्ति इतना कमजोर था कि शरीर का मांस इस कदर सूख चुका था कि उसके हाथों की सिर्फ उभरी हुई नसें ही हड्डियों पर चिपकी दिखाई दे रही थीं जिन्हें चमड़ी के पतले से आवरण ने ढक रखा था...दिन भर के अनवरत सफर के बाद सूर्य देव भी थककर बादलों के आँचल में समा चुके थे और निशा ने अपनी ठंडी चादर चहुँओर पसारना शुरू कर दिया था, शाम का धुँधलका इतना गहरा चुका था कि वह उन बुजुर्ग महानुभाव का चेहरा साफ-साफ नहीं देख पा रहा था...परंतु न जाने उस चेहरे में क्या था कि वह उसे देखने के लिए अधीर हो रहा था....साबह कुली चाहिए! पीछे से आवाज आई, अ न नही उसने अचकचाते हुए जवाब दिया....अचानक ट्रेन की सीटी बजी और ट्रेन पुन: धीरे-धीरे सरकने लगी और अनायास उसका ध्यान उस ट्रेन की तरफ चला गया, ट्रेन ने गति पकड़ ली और देखते ही देखते इतनी दूर निकल गई कि इस गहराते शाम मे काली सी परछाई भी धीरे-धीरे गायब होती हुई दिखाई दी..वह पुनः पलटा पर ये क्या वो बूढ़ा कुली कहाँ गया ? उसने इधर उधर गर्दन घुमाई थोड़ी दूरी पर वो वापस जाता हुआ नजर आया, उसकी चाल में ही उसके शरीर की थकान साफ दिखाई पड़ रही थी हालाँकि कुली की आवश्यकता न थी परंतु न जाने क्यों उसने पुकारा..काका सुनो, बूढ़ा कुली पलटा..बाबूजी मुझे बुलाया? उसने वहीं से पूछा,
हाँ काका आपको ही बुला रहा हूँ....वह बूढ़ा कुली नजदीक आया, लाओ बाबू सामान दो..
न चाहते हुए भी उसने अटैची बूढ़े कुली को दे दी क्या करता ये भी तो नही कह सकता था आपकी स्थिति पर दया आ रही है इसलिए आपको सामान नही दे सकता, ऐसा कहने से उस बूढ़े व्यक्ति के आत्म सम्मान को ठेस पहुँचने का भय था| वह व्यक्ति कितना स्वाभिमानी होगा जो इस जर्जर अवस्था में भी मेहनत करके अपना पेट भर रहा है जबकि शहरों में तो हृष्ट-पुष्ट होते हुए भी कितने ही लोग भीख माँगते हैं....इसीलिए तो उसका मन उस बूढ़े कुली के प्रति सम्मान से भर गया| बैग भी दे दो बाबू, बूढ़े कुली ने कहा..
नहीं काका ये तो बहुत हल्का है मेरे कंधों पर ही ठीक है, अच्छा ये बताओ हरीपुर के लिए कोई सवारी मिलेगी? उसने बैग से ध्यान हटाने के लिए जल्दी से पूछा..
ह हाँ बाबू मिलेगी, लेकिन आप हरीपुर में किसके घर जाओगे?
आप जानते हो काका वहाँ के लोगों को?
हाँ बाबू जानता हूँ, कहकर वह बूढ़ा कुली अटैची को सिर पर रख कर एक ओर को चल पड़ा...
काका वो ठाकुर दीनदयाल हैं न मुझे उनके घर जाना है, कहते हुए वह उनके पीछे-पीछे चल पड़ा...अच्छा, चलो अभी तो आपको टैम्पो मिल जाएगा थोड़ी और देर हो जाती तो कोई सवारी वाला रात को उतनी दूर जाने को तैयार न होता..
हम दूर के कुलियों को तो रात प्लेटफार्म पर ही गुजारनी पड़ती है....बातें करते हुए दोनों स्टेशन के बाहर आ गए, बूढ़े कुली ने सामान एक टैम्पो मे रख दिया और ड्राइवर की सीट पर बैठे तीस-बत्तीस साल के युवक को जैसे अनकही हिदायत देते हुए कहा-हरीपुर के ठाकुर दीनदयाल की कोठी पर जाएँगे, रात की धुँधली रोशनी में अब नजरें गड़ाने के बावजूद वह उनका चेहरा नही देख पा रहा था अभी खंभे की लाइट भी नही जली शायद देर से जलती होगी| काका कितने पैसे हुए उसने पूछा, बाबू अब आपसे पैसे क्या लेना, मेहमान हो आप हमारे...
नहीं काका पैसे तो लेने पड़ेंगे, कहते हुए उसने पचास का नोट बूढ़े कुली के हाथ मे पकड़ा दिया, पर बाबू ये तो बहुत ज्यादा हैं...
कोई बात नहीं काका जब वापस जाउँगा तब बराबर कर लेना| टैम्पो चल पड़ा , उसे अचानक याद आया कि उसने काका की पहचान तो पूछी ही नहीं.. उसने पीछे मुड़कर देखा तब तक काका स्टेशन के गेट से भीतर जा चुके थे.....टैम्पो में सिर्फ पाँच लोग ही थे जो आपस में बातें करने में मशगूल थे, उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता था जैसे वो एक गाँव के न होते हुए भी एक-दूसरे से भली-भाँति परिचित थे, रिहायशी इलाके की गलियों से हिचकोले खाता हुआ टैम्पो अब मेन रोड पर आ गया था वह पूरे दस साल के बाद यहाँ आ रहा है, उसे बदलाव की उम्मीद तो थी परंतु इतनी नहीं जितनी देखने को मिल रही है....कच्चे मकानों के स्थान पर पक्के मकान, गलियाँ भले ही टूटी हुई पर पक्की थीं, गाँव से स्टेशन तक कच्चे रास्ते की जगह पक्की सड़कें.....सड़क के दोनो ओर अँधेरे में वह कहीं बिजली और कहीं लालटेन की रोशनी में टिमटिमाते गाँवों को पहचानने की कोशिश कर रहा था परंतु अभी तक किसी भी गाँव को पहचान न पाया था, कुछ गाँवों के नाम याद थे परंतु उनकी निशानियाँ ढूँढता हुआ कितना आगे निकल आया यह उसे तब पता चला जब ड्राइवर ने कहा-भैयाजी आपका गाँव आ गया|
भैया क्या आपको पता है ठाकुर दीनदयाल के घर का रास्ता, वो मैं काफी सालों के बाद आया हूँ तो सब कुछ मुझे अजनबी सा लग रहा है....
हाँ हाँ भैयाजी चलो मैं आपको कोठी तक छोड़ देता हूँ, कहते हुए उसने सामान उठा लिया, वह चुपचाप बिना कुछ बोले पीछे-पीछ चलने लगा...थोड़ी देर मे बिजली की रोशनी में नहाई ठाकुर साहब की कोठी के सामने थे वे दोनो... ड्राइवर को पैसे देकर उसने धन्यवाद बोलते हुए विदा किया और स्वयं कोठी के भीतर प्रवेश किया |
बूढ़े हो चले चाचा-चाची और उनके इकलौते बेटे उसे देखकर हैरान थे, किसी को उम्मीद न थी कि वो यहाँ वापस आएगा क्योंकि सालों से न कोई खत न संदेश, सभी ने ये सोच लिया था कि अब वह शहर से दूर आना ही नही चाहता, बहू और पोते के लिए तो वह अजनबी ही था वो उसे पहली बार देख रहे थे उनकी आँखों में जाने पहचाने से प्रश्न तैर रहे थे कि वह कौन है, कहाँ से आया, उसका ध्येय क्या है? आदि|
सालों बाद सबने साथ गपशप के बीच भोजन किया, अपने परिवार के बीच आकर वह अत्यंत खुश था परंतु फिरभी कहीं कुछ अधूरा सा महसूस कर रहा था उसका हृदय और मस्तिष्क कुछ ढूँढ रहे थे और भी बहुत कुछ जानना चाहते थे....वह सफर के बाद थक गया होगा उसे अब आराम करना चाहिए ऐसा कहकर चाची ने उसका बिस्तर लगवा दिया और सफर की थकान के कारण निद्रा ने कब उसे अपने आगोश मे ले लिया उसे पता ही न चला|
सूरज की किरणों की तीव्र चमक ने उसे अपनी आँखें खोलने पर विवश कर दिया, वह उठ बैठा खिड़की से सूरज की सीधी रोशनी कमरे मे आ रही थी वह कमरे से निकल कर घर के पीछे वाले बरामदे में आ गया...बरामदे के बाद बड़ा सा आँगन और आँगन की चारदीवारी से बाहर एक छोटा सा घर...

जिसके आँगन की दीवार कहीं-कहीं से टूटी हुई थी, घर पुराना और जर्जर हो चुका था, आँगन में कपड़े सुखाने की रस्सी बँधी हुई थी परंतु ऐसा लगता था कि वहाँ कोई नहीं रहता...वह बरामदे से निकला आँगन पार किया और धीरे-धीरे चलता हुआ उस छोटे से घर के टूटे-फूटे आँगन में आ गया, अनायास ही उसके हाथ कपड़े सुखाने की रस्सी को छूकर कुछ महसूस करने लगे..कहाँ गए होंगे ये लोग? हरीराम काका, काकी और आशा..हाँ आशा कैसी होगी अब? अब तो उसके आठ-नौ साल के बच्चे भी होंगे...सोचते हुए उसके होठों पर एक मुरझाई हुई मुस्कान तैर गई...कैसे वह बचपन से जवानी तक अपने घर से ज्यादा इस घर में रहता था...जब से उसकी माँ का देहान्त हुआ था कमला काकी उसे अपनी औलाद की तरह मानती थीं उनका कोई बेटा नहीं था लेकिन वो हमेशा कहतीं कि मेरी दो औलादें हैं मेरा बेटा विजय और बेटी आशा.... कमला काकी और हरीराम काका ने उसे माँ-बाप का प्यार दिया, एकबार तो काका उसकी खातिर चाचा जी से भी बहस कर बैठे थे, उसे कोई डाँटे वो चाहे चाचा-चाची ही क्यों न हों..काका और काकी को बर्दाश्त नहीं होता था| काकी हर दूसरे तीसरे दिन उसकी पसंद का कुछ न कुछ अवश्य बनातीं और पहले उसे और आशा को खिलाकर तभी किसी और को खाने को देतीं, काका तो उसे अपने कंधे पर बैठाकर खेतों बागों तक तो ऐसे घुमाने ले जाते जैसे वो उनका अपना बेटा हो....उसे याद है चाचा ने एकबार काका से कहा था हरीराम भगवान ने इसे गलती से हमारे घर भेज दिया दरअसल वो भेजना तो तुम्हारे ही घर चाहता होगा....तब काका ने कहा था कि सही कह रहे हो ठाकुर लेकिन भगवान ने अपनी गलती सुधारने के लिए हमे पड़ोसी बना दिया और दोनो हँस पड़े थे| विजय के प्रति काका-काकी के स्नेह ने दोनों परिवारों के बीच की आर्थिक असमानता के भेद को समाप्त कर दिया था|
साथ खेलते-कूदते, आशा और विजय ने जवानी की दहलीज पर कब कदम रखा ये अहसास भी उसे तब हुआ जब एक दिन चाची ने कहा कि वह काका के घर कम जाया करें नहीं तो जवान लड़की है उसकी बदनामी होगी....उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे किसी ने उसे गहरी खाई में धक्का दे दिया हो....उसके मस्तिष्क में कभी ऐसा कोई खयाल आया ही नहीं कि कहीं कुछ बदला हो....हरीराम काका और काकी के व्यवहार में तो कोई बदलाव नहीं आया फिर चाची ने ऐसा क्यों कहा? ये प्रश्न विजय को सोने नहीं दे रहा था, करवटें बदलते हुए जब काफी रात हो गई तो वह उठा और काका के घर की ओर चल पड़ा आँगन के बाँसों को चीरकर बनाए गए दरवाजे को धकेल कर भीतर पहुँचा ही था कि काका की धीमी आवाज उसके कानों में पड़ी और बरामदे में पैर रखते हुए वह वहीं रुक गया.. आशा की माँ क्यों इतनी फिकर कर रही हो जितने मुँह उतनी बातें होती हैं हम किस-किस को रोक सकते हैं?
तो अब क्या हम अपने बच्चे को ही कह दें कि वो हमारे घर न आए, ऐसा कैसे कह सकते हैं हम? काकी की आवाज दुख के गहरे सागर में डूबती हुई सी प्रतीत हो रही थी...
हम ऐसा नहीं कहेंगे, अरे लोगों का क्या अगर वो कहेंगे कि कुएँ में कूद जाओ तो क्या हम कूद जाएँगे...बकने दो लोगों को,चलो सो जाओ और बेकार की चिंता छोड़ो... काका ने आक्रोश में कहा...
आवाजें आनी बंद हो गईं | विजय स्तब्ध होकर जड़वत खड़ा रहा, कुछ देर बाद वह वापस आया और अपने कमरे में जाकर लेट गया उसके दिमाग में तरह-तरह के प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे...बेचैनी में करवटें बदलते-बदलते कब सुबह हो गई उसे पता ही न चला, सुबह तड़के ही उठकर टहलने जाने की आदत थी उसे, किंतु आज उसका मन न हुआ जाने का, वह लेटा रहा और कब उसे नींद आ गई पता ही न चला |
सूरज सिर पर चढ़ आया था जब चाची ने उसे जगाया....क्या हुआ बेटा तबियत तो ठीक है न? हाँ चाची ठीक हूँ, कहते हुए वह उठकर बैठ गया,
ठीक है जाओ नहा-धो लो फिर नाश्ता कर लो बाकी सभी कर चुके हैं, तुम सो रहे थे तो जगाया नहीं...चाची ने कहा|
नाश्ता करके विजय काका के घर जाने लगा किंतु बाहर तक पहुँच कर वापस लौट आया, न जाने क्यों आज वह खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था, काका-काकी उसपर अपनी जान छिड़कते हैं इसलिए उसे कुछ न कहेंगे परंतु वह जानता है कि आज वह उनकी परेशानी का कारण बन गया है....
चाची जी विजय कहाँ है दो दिन से दिखाई ही नही दिया,उसको पता है कि माँ जब तक उसे देख न लें उन्हें चैन नही मिलता फिरभी पता नही कहाँ गायब रहता है, आशा की आवाज ने उसे चौंका दिया, वह उठ बैठा और स्वयं को रोक न सका तुरंत जा पहुँचा काकी के पास, काकी उदास बैठी थीं...
क्या हुआ काकी इतनी परेशान क्यों हो? उसने पूछा
आओ बेटा बैठो, तुम तो दो दिन से आए ही नहीं..क्या हुआ?
तो इसलिए परेशान हो आप, विजय ने मुस्कराते हुए कहा
नही बेटा अब तुमसे क्या छिपाना बात कुछ और है,
विजय का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा..कहीं काकी उसे घर आने को मना न कर दें, फिर उसे माँ की तरह प्यार कौन करेगा, क्या वह रह पाएगा काकी के बिना....
बेटा पिछले महीने जो लोग आशा का रिश्ता पक्का कर गए थे वो आज मना कर गए..काकी ने मायूसी भरे लहजे में कहा,
क्यों? विजय स्तब्ध हो गया
पता नहीं कुछ बताया नहीं बस कह दिया कि अभी वो इस शादी के लिए तैयार नहीं, काकी ने बताया
कोई बात नही काकी वो कोई दुनिया का आखिरी रिश्ता तो था नहीं, और न ही हमारी आशा की उम्र निकली जा रही....इधर-उधर की बातें करके काकी का मन बहलाने के बाद वह बाहर निकल आया....
काकी को तसल्ली तो दे दिया विजय ने पर उसके मस्तिष्क में कई सवाल उमड़ने लगे...कहीं आशा का रिश्ता टूटने की वजह वही तो नहीं, आखिर आशा में कमी ही क्या है? सुंदर है, सुशील है, थोड़ा बहुत अक्षर ज्ञान भी है फिर ऐसी लड़की को कोई क्यों मना करेगा, दहेज भी वजह नजर नहीं आती आदि....सोचता हुआ वह काकी के घर से सीधा नदी की ओर जाने लगा, कुछ देर अकेले में शांति से रहना चाहता था......
हरीराम की बेटी का रिश्ता टूट गया तुम्हें पता है?  उसके आगे चलती दो बजुर्ग स्त्रियाँ आपस में बतिया रही थीं...हाँ पता है और उसका कारण भी वो उनका मुँहबोला बेटा विजय और खुद आशा ही है, जब देखो उन्हीं के घर में घुसा रहता है...दूसरी महिला ने कहा...अभी दो दिन पहले की बात है कोई कह रहा था कि वो रात को भी उनके घर से निकला था, अब जवान लड़का है कमला और हरीराम को भी सोचना चाहिए मुँहबोला ही तो है सगा तो नहीं है...अब उसपर नियंत्रण तो रखना ही चाहिए....विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई, उसके विषय में लोग ऐसा सोचते हैं, उसने तो सपने में भी कल्पना न की थी, जिन काका-काकी ने उसपर अपना प्यार लुटाया आज वह उन्हीं की बेटी के बदनामी का कारण बनता जा रहा है....क्या दोष है उन लोगों का? अब वह ऐसा नहीं होने देगा, वह उनकी परेशानी का सबब नहीं बनेगा सोचता हुआ वह वापस घर की ओर मुड़ गया |
अगले ही दिन विजय ने चाचा जी को अपना निर्णय बता दिया कि वह आगे की पढ़ाई के किए शहर जा रहा है...उसने सोचा कि उसके जाने के बाद लोग आशा के बारे में बातें बंद कर देंगे और उसका विवाह किसी अच्छे लड़के से हो जाएगा, उसे लगा था कि चाचा को मनाने में शायद कठिनाई हो पर उसकी आशा के विपरीत चाचा जी तुरंत मान गए, शायद वह भी वही सोच रहे थे जो विजय सोच रहा था....
सभी तैयारियों के बाद शाम को निकलने से पहले विजय काका के घर गया उनका आशीर्वाद लेने....काकी उसके जाने की बात सुनते ही रोने लगी थीं, काका की भी आँखें नम थीं आशीर्वाद देते हुए काका ने कहा- मैं जानता हूँ बेटा तूने ऐसा फैसला क्यों लिया..मैं तुझे रोकूँगा नहीं तू शायद सही कर रहा है, पर अपने काका-काकी को भूलना मत मिलने आते रहना...
जरूर काका..मैं भला उन्हें कैसे भूल सकता हूँ जो मेरे माता-पिता हैं..विजय की आवाज रुँध गई,
मेरी शादी में तो आओगे न..पास खड़ी आशा ने कहा और अपने आँसू छिपाने के लिए मुँह दूसरी ओर घुमा लिया, हाँ....विजय आगे बोल न सका वह रो पड़े इससे पहले ही वह काका-काकी के पैस छूकर जल्दी से बाहर आ गया....आँखों में आँसू भरे होने के कारण उसे कुछ साफ दिखाई नही दे रहा था...
वह एक बेटे का फर्ज निभाने के लिए, काका-काकी के स्नेह का कर्ज चुकाने के लिए आज उन सभी से दूर जा रहा है जिनके बिना उसका एक पल भी न कटता था, परंतु आज उसके लिए दूर जाना ही आशा की जिंदगी को सही दिशा दे सकता है.....सोचते हुए वह गाँव से बाहर पहुँच चुका था वह पीछे मुड़कर जीभर कर अपने गाँव को देख लेना चाहता था, न जाने कब फिर यहाँ आना हो...ज्यों ही उसने गर्दन घुमाई....काका लगभग दौड़ते हुए आ रहे थे, उनके एक हाथ में थैले जैसा कुछ था...विजय वहीं ठिठक गया...
नजदीक आकर काका ने लगभग हाँफते हुए उसकी ओर थैला बढ़ाते हुए कहा-ये तुम्हारे लिए आशा ने स्वेटर बुना था कह रही थी सर्दी आने पर देगी और काकी ने तुम्हारी पसंद के लड्डू रखे हैं खा लिया करना, थोड़ा रुक कर काका ने विजय के सिर पर हाथ फेरते हुए भीगी हुई आवाज मे कहा, बेटा अपना ध्यान रखना खाने-पीने में लापरवाही न करना और जाते ही खत लिखना..
आप चिंता न करें काका मैं अपना ध्यान रखूँगा, आशा की शादी अच्छे घर-परिवार में करना लड़के की पूरी तरह से पूछताछ कर लेना, जल्दबाजी न करना...कहकर विजय ने विदा लिया....
कौन...कौन हो बाबू? पीछे से आई आवाज ने विजय की तंद्रा भंग की....
वह पीछे मुड़ा..वही दुबला-पतला मात्र हड्डियों का ढाँचा बुजुर्ग सामने खड़ा था |
विजय को काटो तो खून नहीं...क्काका ये कैसी हालत हो गई है आपकी, वह काका से लिपट कर रो पड़ा...विजय बेटा ये तू है...मुझे तो कल ही लग रहा था लेकिन अँधेरे में पहचान नहीं पाया और इतने सालों बाद उम्मीद भी तो छूट चुकी थी.....
मुझे माफ कर दो काका, पर ये सब क्या है ? आपकी ऐसी हालत और काकी कहाँ हैं, आशा कैसी है ? घर की ऐसी हालत क्यों है जैसे कोई रहता ही न हो ? उसने एक ही सांस में कई सवाल पूँछ डाले
बेटा बुढ़ापे का शरीर है क्या करें, तू खड़ा क्यों है आ भीतर चल..काका हाथ पकड़कर उसे भीतर बरामदे में बिछी खाट पर ले गए...दोनों बैठे, काका ने उसे बताया कि काकी आशा की शादी एक अच्छे अमीर खानदान के इंजीरनियर बेटे से हो गई है...दहेज देने और धूमधाम से शादी करने के लिए उन्होंने अपने खेत बेच दिए, काकी ने ही जिद की थी कि नसीब से अच्छा घर-वर मिल रहा है तो उसे हाथ से जाने नहीं देना चाहिए... और तुम भी तो चाहते थे न कि आशा की शादी अच्छे खानदान में हो तो तुम्हारी इच्छा की अवहेलना कैसे करते.....
और काकी...काकी कहाँ हैं ? विजय को जैसे कुछ अनजाना सा डर सता रहा था कि कहीं कोई बुरी खबर न हो उसकी धड़कनें तेज हो रही थीं..
बेटा वो आशा की तबियत कुछ खराब थी तो काकी वहीं गई है उसे देखने....देखना तुम्हारे आने की खबर मिलते ही वो बल्लियों उछलेगी, पागलों की तरह तुम्हारा इंतजार किया है उस पगली ने...कहते हुए काका की आँखें भर आईं
माफ कर दो काका अब शिकायत का मौका नही दूँगा....और आपका यह बेटा अब आपको कुली का काम भी नहीी करने देगा....मैं अपने काका काकी के बुढ़ापे की लाठी बनूँगा.....
बेटा तुमने शादी की? काका ने पूछा
आप लोगों के आशीर्वाद के बिना कैसे कर सकता था...अब तो आप ही अपने बेटे के लिए बहू ढूँढ़िएगा...अब मुझे काकी को लेने जाना है कहते हुए विजय उठ खड़ा हुआ......

साभार...मालती मिश्रा

Tuesday, 27 October 2015

दोस्त

                 
सितारों की भीड़ से चुराया है आपको,
दिल से अपना दोस्त बनाया है आपको |
इस दिल को कभी टूटने न देंगे,
क्योंकि इसी दिल में छिपाया है आपको ||

Saturday, 24 October 2015

राजनीति का शिकार साहित्य


 आज गुरु जी की एक बात याद आ रही है..एक बार किसी बात पर उन्होंने एक छोटी सी कहानी सुनाई थी...कि किस प्रकार जंगल में खरगोश द्वारा आसमान गिरने की बात सुन सभी जानवर बिना सच जाने उसके पीछे भाग लेते हैं...हमारे देश में कुछ ऐसी ही भेड़चाल अक्सर देखने को मिलती है, जिधर भीड़ जा रही हो सभी उसी ओर चल पड़ते हैं...
आज फिर से कुछ ऐसी ही लहर चल पड़ी है...एक व्यक्ति जिस राह जा रहा है दूसरे बिना विचारे उसी राह पर चल पड़ते हैं और ये किसी भोले-भाले कम पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात नहीं कर रही मैं बल्कि समाज के उच्च शिक्षित वर्ग की बात कर रही हूँ....जी हाँ आज हमारा साहित्यिक वर्ग जागरूक हो गया है....सचमुच बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि जो साहित्यिक वर्ग साठ-पैंसठ सालों से सोया हुआ था वह आज जाग गया....उसकी नींद टूट गई और आँख मलता हुआ उठ खड़ा हुआ और जिसको जिधर जाते देखा बिना सोचे-समझे, बिना अपने विवेक को कष्ट दिए स्वयं भी उधर ही चल पड़ा| खैर अच्छा लगा यह देखकर कि चलो सुबह का भूला शाम को ही सही घर तो लौटा.....देर आए दुरुस्त आए....पर फिर भी इन्हें अर्ध निद्रा में देख ये कहने को मन करता है-उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुँह धो लो...ताकि आँखों से नींद का आवरण हटे और कुछ खुद के विवेक से सत्य को साफ-साफ देख सको....
साहित्य के ज्ञाता हो साहित्यिक हृदयधारी हो विवेकशील बुद्धिजीवी हो फिर तुम्हारे लिए तो प्रत्येक प्राणी एक समान होना चाहिए मुख्यतः मानव...तुम्हारे हृदय में तो सभी के लिए दयाभाव भी समान होना चाहिए....और वो है भी| परंतु ये करुणा अभी क्यों दिखाई दी ? जब एक अल्पसंख्यक को बेरहमी से मार डाला गया...उस वक्त ये करुणा कहाँ थी जब मुजफ्फर नगर में अल्पसंख्यकों ने बहुसंख्यकों को बर्बरता पूर्वक काटा था, उस वक्त आपका हृदय क्यों नहीं पसीजा जब गोधरा कांड हुआ,उस वक्त आपकी नींद क्यों नहीं टूटी जब कश्मीरी पंडितों को बेघर किया गया? तब आप सब बुद्धजीवियों को क्या भांग देकर सुला दिया गया था, जब अयोध्या कारसेवकों की नृशंस हत्याएँ हुईं और परिणाम स्वरूप हजारों निरपराधों को जघन्यता पूर्वक मारा गया, उस वक्त आप सभी साहित्यकार किन सपनों की दुनिया की सैर कर रहे थे जब सरदारों की नृशंसता पूर्वक हत्या कर रहे थे?  क्या वजह है कि आप सभी बुद्धजीवियों में अचानक ही जागरूकता आ गई....या फिर जिस प्रकार रावण ने सभी वीरों को समाप्त होते देख कुम्भकरण को जगाया और एक शक्तिशाली अस्त्र के रूप में प्रयोग किया उसी प्रकार आप लोगों को एक हथियार की तरह तैयार किया जा रहा था कि जब सभी अस्त्र-शस्त्र (सूट-बूट, जुमला, मँहगाई,हर व्यक्ति के अकाउंट में पंद्रह लाख ₹) समाप्त हो गए तब साहित्यिक बाहुबलियों को मैदान में उतारा गया....और अब एकदम ही सभी महारथी नमक का कर्ज उतारने मैदान में आ डटे...जो आना चाहते थे वो भी और जो नहीं आना चाहते थे वो भी...
इन सभी बुद्धिजीवियों के समक्ष मेरा कद बहुत ही छोटा है..अभी तो मैं खड़े होना सीख रही हूँ परंतु इतना ज्ञान मुझे भी है कि सत्य को हमेशा अकेले ही लड़ना पड़ता है और बुराइयाँ सदैव एकजुट होकर चौतरफा वार करती हैं तो मैं ये कैसे मान लूँ कि इन सभी साहित्यिक महारथियों को कौरव और पांडवों की पहचान न होगी...क्या ये सभी जागरूक वर्ग ये कहना चाहते हैं कि साठ-पैंसठ सालों में जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक हुआ वो सब सही था और आज जो कुछ भी हो रहा है वो सब गलत है...यदि ऐसा है, यदि ये सत्य होता तो कोई अवॉर्ड तो नहीं है मेरे पास पर मैं अपनी लेखनी त्याग देती....
पर मैं जानती हूँ ये सही नहीं, यदि एक अल्पसंख्यक की हत्या जुर्म है तो अनेकों बहुसंख्यकों की हत्या भी उतना ही जुर्म है...यदि साहित्यिक वर्ग सचमुच जागरूक होता तो अपने शस्त्र से युद्ध करता....बुराई के खिलाफ अपने कलम की आवाज को बुलंद करता न कि हथियार छोड़कर ये कहकर भागता कि अब हमने लड़ना बंद कर दिया और ये बुराई हमसे देखी नहीं जा रही है इसलिए हम विरोध स्वरूप आँखें बंद करके ध्यानमग्न होने जा रहे हैं....
कितने दुख की बात है कि यहाँ आपसी रंजिश को भी दलित दमन का रूप दे दिया जाता है और बच्चों के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने की बजाय उसका नुमाइश बना दिया जाता है और ये सब राजनीति के चलते होता है...परंतु हमारे साहित्यिक योद्धा इस कृत्य के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाते...क्या करें बेचारे शायद करुणाघात से निःशब्द हो गए होंगे या अपने शस्त्र त्याग पहले ही निःशस्त्र हो चुके हैं, या फिर मैं ये कहूँ कि इस प्रकार की नकारात्मक राजनीति के पक्षधर ये हमारे साहित्य-सैनिक भी हैं....
विचारणीय है कि एक शक्तिशाली शस्त्र भी यदि अपनी स्वतंत्रता खोकर अंधभक्ति करने लग जाएगा तो देश किस ओर जाएगा.....

साभार...मालती मिश्रा

Wednesday, 21 October 2015

नारी के प्रति बढ़ते अपराधों का जिम्मेदार कौन ?


 हमारे देश की संस्कृति प्राचीनतम और विश्वविख्यात है, हमारा देश ही वह महिमामय देश है जिसकी पावन भूमि पर महान रिषि-मुनियों ने जन्म लिया, यही वो पावन भूमि है जहाँ भगवान राम और भगवान कृष्ण ने अवतार लिया इसी देश की संस्कृति से विश्व के अन्य धर्मों व संस्कृतियों का प्रादुर्भाव हुआ| धर्मों की दृष्टि से भी देखा जाय तो विभिन्न धर्मों के प्रवर्तक जैसे महात्मा बुद्ध, महावीर जैन आदि ने इसी पावन भूमि को गौरवान्वित किया| वीरता की दृष्टि से भी हमारे देश को सम्राट अशोक, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई जैसे अनेक वीरों ने गौरवान्वित किया|
हमारे देश में जहाँ पहले स्त्री को देवी समान माना जाता था, कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा आज उसे भोग का साधन मात्र मान लिया गया है........
यहाँ स्त्री को पूजनीय मानकर सदा उसका सम्मान किया जाता रहा है , यदि हम अपने धार्मिक ग्रंथों का भी अवलोकन करें तो पाएँगे कि जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए जिन चीजों की आवश्यकता होती है उन सभी की स्वामिनी स्त्री ही है....जैसे-हमें जीने के लिए धन,विद्या(ज्ञान) और शक्ति की आवश्यकता होती है और इन तीनों ही महत्वपूर्ण शक्तियों की स्वामिनी क्रमश: लक्ष्मी जी,  सरस्वती जी और दुर्गा जी हैं...अर्थात् इस पुरुष प्रधान समाज में स्वयं को सर्व समर्थ मानने वाला पुरुष भी निष्कंटक जीवन तभी जी सकता है जब उस पर देवियों की कृपा हो और हर व्यक्ति इस बात को भली भाँति जानता भी है....इसीलिए विभिन्न रूपों में देवियों की पूजा की जाती है|परंतु दुनिया को रास्ता दिखाने वाले इस देश की गरिमा आज इसी के नागरिकों द्वारा कलंकित हो रही है, जिस देश में स्त्री को देवी माना जाता है उसी देश में कन्या भ्रूण हत्या द्वारा उन्हें दुनिया में आने से पहले ही खत्म कर दिया जाता है और जो दुनिया में आ गईं उनमें से कितनों को घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, छेड़-छाड़, तेजाब हमला, बलात्कार जैसे शर्मसार कर देने वाली प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है.....आज स्त्री बेखौफ होकर कहीं भी आ-जा नहीं सकती, आजकल के पुरुषों की मानसिकता इतनी कुंठित हो गई है कि स्त्री तो स्त्री छोटी-छोटी बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बनाते हैं, ऐसी विक्षिप्त मानसिकता के लोग न सिर्फ लड़कियों के मन में समाज के प्रति असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर रहे हैं बल्कि सभ्य पुरुषों की छवि भी खराब कर रहे हैं| आज समाज में कोई भी लड़की किसी भी व्यक्ति पर आसानी से विश्वास नहीं कर सकती भला इस प्रकार से किसी समाज या देश का विकास कैसे संभव हो ? जहाँ छोटी-छोटी बच्चियाँ भी सुरक्षित नहीं....

समाज में इस तरह की अराजकता फैलाने वाले बीमार मानसिकता के शिकार होते हैं किंतु इनकी ऐसी मानसिकता का जिम्मेदार आखिर है कौन?
आजकल छोटो-छोटे लड़के भी बेखौफ होकर तरह-तरह के अपराधों को अंजाम देते हैं जिनमें एक बलात्कार भी है| यदि मैं इसपर विचार करती हूँ तो मुझे तो बस यही समझ आता है कि ऐसे अपराधों का जिम्मेदार हमारा समाज और सबसे अधिक परिवार है जो अपने बच्चों को नैतिकता की शिक्षा नहीं दे पाता| लोग पुलिस और कानून पर उँगली उठा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं, नेता या स्वयं को समाज का शुभचिंतक बताने वाले ऐसी हर घटना के बाद अपनी राजनीति करना नहीं भूलते और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर जनता की नजर में स्वयं को उसका हितैषी साबित करने का  प्रयास करते हैं और कुछ रूपयों से और सहानुभूति के बोल बोल कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं...बहुत हुआ तो कैंडल मार्च करते हुए जनता के साथ सड़कों पर उतर आए.. पर क्या आज तक ऐसे कदमों से अपराधों में कोई कमी आई है? उल्टा अपराधी भी विरोध करने वालों में शामिल होकर कैंडल मार्च का हिस्सा बन शरीफों की भीड़ बढ़ाता है.....

मैं नहीं कहती कि कानून सख्त नहीं होने चाहिए बल्कि मैं तो ये कहती हूँ कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए एक जुर्म की एक समान सजा सबके लिए होनी चाहिए फिर चाहे वो साठ साल का बुजुर्ग हो, पच्चीस साल का युवा हो या तेरह-चौदह साल का नाबालिग....किंतु सवाल यह है कि नौबत यहाँ तक आए ही क्यों ?क्यों बच्चों की मानसिकता इतनी कुंठित होती है कि वो हैवानियत पर उतर आते हैं? यदि मैं ये कहूँ कि हमारा हाईटेक टेक्निकल समाज ही इसका जिम्मेदार है तो गलत नहीं होगा....आजकल हमारे देश में भी शहरों में सत्तर प्रतिशत परिवार एकल परिवार होते हैं जिनमें अधिकतर परिवारों में माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं वो बच्चों को पूरा समय भी नहीं दे पाते जिससे बच्चे अपने मनोरंजन व पढ़ाई के लिए भी क्रमश: टेलीविजन और ट्यूशन व कंप्यूटर आदि पर निर्भर रहते हैं, ऐसे में वो उन नैतिक मूल्यों से वंचित रह जाते हैं जो पहले घरों में बच्चों को अपने दादा-दादी व माता-पिता से मिला करते थे| साथ ही आज की आधुनिक सोच जिसके तहत माता-पिता बच्चों का भविष्य बनाने के नाम पर उन्हें उस उम्र में अधिक छूट दे देते हैं जब उन पर ज्यादा अंकुश की आवश्यकता होती है..पढ़ाई के नाम पर अधिक से अधिक समय घर से बाहर बिताते हैं, माता-पिता बिना सवाल किए बच्चों की हर माँग को पूरा करते हैं तथा कभी पैसों का हिसाब नहीं  माँगते, ये भी किशोरावस्था के लड़कों के बिगड़ने का एक कारण है....
आजकल माता-पिता बच्चों को आधुनिक सुविधाएँ मुहैया कराकर अपने-आपको जिम्मेदारी से मुक्त मान लेते हैं जिसके कारण बच्चे मनमाने तरीके से दोस्तों के साथ बिना अच्छे-बुरे का भेद जाने वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है उन्हें पता है कि यदि उनसे गलती भी हो गई तो उन्हें बच्चा समझ कर छोड़ दिया जाएगा|
आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराते हुए बच्चों को मानसिक या शारीरिक आघात न पहुँचे इन बातों का ध्यान रखते हुए आजकल स्कूलों में भी बच्चों को किसी भी प्रकार से दंडित नही किया जाता, इसलिए बच्चे स्कूलों में भी मनमानी करते हैं...दोष स्कूलों का नही यदि माता-पिता ही नही चाहते कि उनके बच्चे को सिखाने के लिए सख्ती बरती जाय तो क्यों कोई स्कूल अपने लिए परेशानी खड़ी करेगा इसीलिए स्कूल भी लिखित सूचना आदि देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं|
इसके साथ ही आजकल विद्यालयों में बच्चों को मातृभाषा, मातृभूमि,देशभक्ति,संस्कृति,संस्कार, समाज के प्रति कर्तव्य, नैतिकता आदि की बातें बताना तो दूर इनसे बच्चों को पूर्णतया अनभिज्ञ रखा जाता है, बच्चों को विदेशी भाषा, विदेशी संस्कृति का ज्ञान तो होता है किंतु अपने देश की संस्कृति से अनभिज्ञ होता है...सभी नामी स्कूलों का महज एक ही ध्येय होता है स्वयं को राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाश्चात्य शैली में सर्वोपरि लाना, जबकि यदि यही स्कूल बच्चों को सर्वोपरि रखकर कार्य करें तो समाज में ऐसी समस्याएँ उत्पन्न न हों...
इस प्रकार जब सभी (माता-पिता, स्कूल) अपनी जिम्मेदारियों का महज दिखावा करते हैं तो बच्चे को नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाए??  परिणामस्वरूप यही बच्चे ऐसे-ऐसे अपराधों को अंजाम देते हैं जो कि मानवता को शर्मसार कर दे....

बेटियाँ जो माँ-बाप की लाडली हैं, बेटियाँ जो घरों की लक्ष्मी हैं, बेटियाँ जो दो-दो कुलों का भविष्य हैं, बेटियाँ जो माँबाप के साथ देश का भी गौरव हैं.....उन बेटियों को समाज में सुरक्षित वातावरण देना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है और इसके लिए सबसे जरूरी है प्रत्येक परिवार में अपने बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देना तथा विद्यालयों को भी पाश्चात्य सभ्यता के पीछे भागना छोड़ अपनी संस्कृति और सभ्यता पर जोर देना चाहिए ताकि निकट भविष्य में एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके......

साभार- मालती मिश्रा

Saturday, 17 October 2015

हर रात का सवेरा होता है....


चली थी कभी किसी के दम पर
अपनी सारी दुनिया छोड़ कर
सपने सजाकर आँखों में
सुनहरे दिन और चाँदनी रातों के
धीरे-धीरे समय ने ली करवट
दिन ढलने लगा अँधेरे की गोद में
खुशियों का सूरज ढलने लगा 
गमों के काले बादल में
सामने थी एक काली स्याह लंबी रात
जिसका कोई सवेरा न था
चली थी जिसका हाथ थाम
वो नजर आता था बेगाना
लगता था शमा से भाग रहा परवाना
रोज रहता था उसकी आँखों को इंतजार
कब ढले गम की रात आए सुबह की बहार
पर लगता था इस रात का
कोई सवेरा ही न था
हो चली थी मैं जिंदगी से बेजार
तन्हा अकेली जिए जा रही थी
तन्हाई का जहर घूँट-घूँट पिये जा रही थी
तभी.......
रात के अँधेरे को चीरती हुई
उम्मीद की एक किरण कुछ यूँ चमकी
मानों प्यासे को पानी नहीं 
सागर मिला हो
भूखे को भोजन नहीं
अन्नपूर्णा का वरदान मिला हो
तुम मेरी जिंदगी में आई वरदान बनकर
शायद किसी पुण्य का परिणाम बनकर
मैं झूम उठी, मेरा रोम-रोम खिला उठा
मेरी नन्हीं कली को पा
मेरे सपनो का उपवन महक उठा
मुझे विश्वास हो गया
कि हर रात का सवेरा हेता है...

साभार....मालती मिश्रा


Wednesday, 14 October 2015

कैसे भूलूँ बचपन तुझको..


शहरों की इस भाग-दौड़ में,
इक याद जो मुझसे कहती है...
मेरे तो रग-रग मे अब भी,
मेरे गाँव की खुशबू बसती है |
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.....
इक जीवन तुझमें जिया मैंने
बाबुल की उन गलियों में
मेरा बचपन अब भी रहता है
आमों की अमराइयों में,
पेड़ों के घने झुरमुटों में
मेरे गाँव की पगडंडी पर,
हर खेतों के हर मेड़ों पर,
मेरे भीतर की इक नन्ही परी
हर पल मुझसे कहती है....
मेरे तो रग-रग में अब भी
मेरे गाँव की खुशबू बहती है |
मेरे सांसो के हर तार में,
हर धड़कन की झंकार में
खेतों की खु्शबू बिखरी है
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.........
तू मुझमे अब जिन्दा है
छूट गया तेरा हाथ जो मुझसे,
इसलिए तो हम शर्मिंदा हैं |
वो सखियों संग लुकना-छिपना
तितली के पीछ-पीछेे भगना
पेड़ों पर चढ़ना फिर गिरना,
गिरकर उठना उठकर गिरना
वो छड़ी पे टिकाना टोकरी को,
चिड़ियाँ पकड़ने की जुगत लगाना
धानों के सूखे पुआलों के
ढेरों पर चढ़कर इतराना
कैसे भूलूँ बचपन तुझको......
तुझमें ही गाँव बसा मेरा
पेड़ों के झुरमुटों में से वो
सूरज की लाली का तकना
चिड़ियों की चहक फूलों की महक,
सब सोने के रंग सा रंगना
वो खेतों खलिहानों से जुड़ी यादें,
मुझसे हर पल कहती हैं
कैसे भूलूँ बचपन तुझको...
मेरे तो रग-रग में अब भी
मेरे गाँव की खुशबू बसती है.....
जो हर पल मुझसे कहती है....
कैसे भूलूँ बचपन तुझको....
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.......

चित्र: साभार..गूगल से..
साभार....मालती मिश्रा

Saturday, 10 October 2015

मेरी दादी


ट्रिन...ट्रिन...
फोन के बजने की आवाज आ रही थी पर मैं बाथरूम में थी उठा नही सकती थी, घर पर भी कोई नहीं था जिसे फोन उठाने को कहती....पता नही किसका फोन होगा, क्या पता कोई जरूरी फोन भी हो सकता है...सोचते हुए जल्दबाजी में मेरे हाथ से पानी का मग छूट गया और फोन की घंटी भी बंद हो गई | दस-पंद्रह मिनट में मैं बाथरूम से बाहर आई आते ही सबसे पहले मैं अपने फोन की ओर लपकी और मिस्डकॉल चेक किया कोई अनजान नंबर था |
खैर छोड़ो मुझे किसका जरूरी फोन आने लगा?सोचते हुए मैंने फोन टेबल पर रख दिया,
लेकिन पता नही क्यों जैसे किसी के फोन का इंतजार कर रही थी..पर किसका? नहीं जानती | वैसे भी जिसका कोई नहीं होता वो कुछ अधिक ही लोगों को अपना कहने का आदी होता है, शायद ये मन के भीतर की वो अनकही चाह होती है जिसे किसी के साथ साझा नहीं कर सकते या फिर स्वयं को बहलाने का एक निमित मात्र...फिर चाहे भले ही लोग 'थोथा चना बाजे घना' कहकर मेरे पीछे हँसते हों| मेरी दुनिया भी मेरे परिवार तक ही सिमटी हुई है, न कोई रिश्तेदार न ही कोई सखी सहेली, जो भी हैं वो सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं जिनसे कभी-कभी फोन पर ही बात हो पाती और जाना तो सालों में हो पाता....मैं तो खुद से ही बातें कर लेती हूँ खुद ही खुशी मना लेती हूँ और कोई दुख हो तो अकेली ही बैठकर रो-धोकर शांत हो लेती हूँ...फिरभी मेरे भीतर का खालीपन मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ता, और शायद यही खालीपन मुझे ये उम्मीद नही छोड़ने देता कि मैं अकेली नहीं हूँ | मेरा एक छोटा-सा परिवार तो है, पति और मेरी दो बेटियाँ...और मेरी पूरी दुनिया मेरे छोटे से परिवार के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है...मेरा जीना-मरना सब इन्हीं के लिए है...आज मैंने ऑफिस से छुट्टी ली हुई थी कि घर पर थोड़ा आराम करूँगी, पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद घर की रोजमर्रा की सफाई बगैरा करके नहाकर नाश्ते की तैयारी करने लगी अचानक फिर से फोन बज उठा मैं जल्दी से बैठक की ओर लपकी और इतनी जल्दबाजी में फोन उठाया कि मेरे हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा, मुझे नहीं पता था कि किसका फोन होगा परंतु ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं इसी का इंतजार कर रही थी मैंने नंबर देखे बिना ही फोन उठा लिया...
हलो...
हलोsss दूसरी तरफ से आवाज आई,
माँ..प्रणाम, कैसी हो आप ? एक पल को ऐसा लगा मेरा इंतजार पूरा हुआ शायद मैं इसी फोन का इंतजार कर रही थी
मैं ठीक हूँ बेटा, बहुत दिनों से तुमने फोन नहीं किया तो चिंता हो रही थी, सब ठीक तो है ? माँ ने अपने उसी चिर-परिचित गाँव की भाषा में पूछा
सब ठीक है माँ, मैने कई बार फोन किया था पर आपका नंबर ही नही लग रहा था...मैंने शिकायत भरे लहजे में जवाब दिया
हाँ वो फोन खराब हो गया था इसीलिए....अब दूसरा लिया है,
अच्छा माँ और सब ठीक है वहाँ, मैंने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा
वैसे तो सब ठीक है...तुम्हारी दादी जी नहीं रहीं..
क्या...मेरे हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा...
कब? क्या हुआ था? मैंने पूछा, मुझे अपनी ही आवाज दूर से आती प्रतीत हो रही थी |
दो महीने हो गए, तुम्हें तो पता ही है कितनी बूढ़ी हो चुकी थीं, बीमार थीं....
और आप मुझे आज बता रही हो माँ, मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा, मैं भी आ जाती..अनजाने ही मेरा गला भर आया पर मैं रोना नहीं चाहती थी, नहीं चाहती थी कि माँ को मेरे रोने का पता चले..
क्या करतीं बेटा आके, देख तो तब भी नहीं पाती इतनी दूर जो हो..माँ ने कहा, अब तुम परेशान मत हो अपना ध्यान रखना मैं अभी फोन रखती हूँ....माँ ने कहा
ठीक है माँ, प्रणाम.......मैंने फोन रख दिया|
मैं धम्म से सोफे पर बैठ गई, मेरी दादी जी मर गईं और किसी ने मुझे बताना जरूरी नहीं समझा..क्यों?
एक दादी ही तो थीं जिनसे मैं सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस करती थी, मुझे आज भी याद है जब मैं छोटी थी माँ पापा के साथ लखनऊ में रहती थी पापा की सरकारी नौकरी थी तो हमारा पूरा परिवार लखनऊ में ही रहता, जब स्कूल की गर्मियों की छुट्टियाँ होतीं तो हम सभी गाँव जाने के लिए इतने उतावले होते थे कि एक-एक दिन काटना मुश्किल होता था| रोज पापा से पूछते कि आपको छुट्टी कब मिलेगी? चाचा के लड़कों के लिए खिलौने, पापा के चचेरे भाई यानी मेरे चाचा जो लगभग मेरी ही उम्र के थे उनके लिए मैं अपनी किताबें ले जाती और हम कंचे भी इकट्ठा करके रखते थे कि गाँव में खेलेंगे, उन्हें भी सहेज कर रख लेते....कुछ ऐसी ही होती थी हम बच्चों के गाँव जाने की तैयारी, हमें मतलब नहीं होता था कि माँ-पापा क्या लेकर जा रहे हैं क्या नहीं ये तो हमारी व्यक्तिगत तैयारी होती थी|

गाँव पहुँचने पर गाँव से बाहर ही दादी खड़ी मिलतीं हाथों में पीतल के चमकते हुए लोटे में जल लेकर,वो पहले जल भरे लोटे को हमारे सिर से पैर तक वारती फिर उस जल को एक तरफ किसी देवी या देवता को डाल देतीं तब कहीं हमें गाँव में प्रवेश की अनुमति देतीं | घर पहुँच कर सब अपने अपने अनुसार काम, खेल, रिश्तेदारी के निर्वाह आदि में व्यस्त हो जाते थे और मैं व्यस्त हो जाती थी दादी के साथ....

दादी वैसे तो अपने सभी पोतों को भी प्यार करती थी परंतु उनका लगाव मुझसे कुछ विशेष ही था...सर्दियों मे जब गुड़ बनाया जाता तो मेरे लिए सोंठ और मेवे डालकर बनवाया हुआ गुड़ वो बचा कर गर्मियों की छुट्टी तक रखती थीं, पका हुआ सीताफल एक जरूर बचाकर रखतीं ताकि जब हम छुट्टियों में आएँ तो वो हलवा बनाकर मुझे खिला सकें, इतना ही नहीं वो हर जगह मुझे अपने साथ ले जातीं और मैं भी..
जहाँ दादी वहीं मैं, दादी खेतों में जातीं तो मैं भी साथ जाती, वो बगीचे में जातीं तो भी मुझे ले जातीं और तो और वो दूसरे गाँव में जो कम से कम डेढ़-दो किलोमीटर होगा वहाँ गेहूँ पिसवाने जातीं तो भी मैं उनके साथ होती, किसी के घर,किसी की खुशी में, किसी के गम में,पूजा-पाठ में..कहीं भी कभी भी वो अकेली नहीं जाती थीं और यदि जाना भी चाहतीं तो मैं नहीं जाने देती..यहाँ तक कि रात को भी मैं माँ के पास नहीं सोती थी| हम जब तक गाँव में रहते मैं दादी के पास ही सोती थी, हम कभी छत पर सोते तो दूर किसी गाँव मे एक बल्ब जलता दिखाई देता था मैंने एक बार दादी से पूछा था कि वहाँ पर लाइट कैसे जलती है जबकि हमारे गाँव में नही है, दादी ने क्या जवाब दिया मुझे याद नहीं पर एक बात जो उन्होंने बताई थी वो मुझे आज भी याद है कि बिजली वहाँ भी हर घर में नही जलती, जो बल्ब हमें दिखाई देता है वो आटा-चक्की पर जलने वाला बल्ब था....कुछ ऐसी ही बातें होती रहती थीं मेरे और दादी के बीच और वो रोज एक नई कहानी सुनाते हुए धीरे-धीरे मेरे बालों में हाथ फेरती रहतीं और मैं कहानी सुनते हुए कब स्वप्नलोक की सैर पर निकल जाती मुझे पता ही नहीं चलता| मेरे बालों में उनकी उँगलियों का वो कोमल स्पर्श मुझे आज भी महसूस होता है....

गाँव में कहाँ नदी है, कहाँ तालाब है हमारे कितने खेत हैं और कहाँ-कहाँ हैं ये मुझे दादी के ही कारण पता चला....
मेरे पापा जी तीन भाई हैं और पूरे परिवार में मैं अकेली लड़की, शायद ये वजह भी रही हो मेरी दादी के प्यार की| जो भी मुझपर कोई टिप्पणी करता उसका पहला सवाल यही होता था कि मैं लखनऊ में दादी के बिना कैसे रहती हूँगी.....
खैर छुट्टियाँ खत्म होतीं दादी हमें नम आँखों से गाँव के बाहर काफी दूर तक छोड़ने आतीं और जाते हुए मैं बार-बार मुड़-मुड़ कर उन्हें तब तक देखती रहती जब तक दूर और दूर होते हुए वो मात्र एक छोटी सी परछाई में तब्दील नहीं हो जातीं और फिर दादी की परछाई अपने साथ आई अन्य दूसरी परछाइयों के साथ धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती|

हर साल गर्मियाँ आतीं, स्कूल की छुट्टियाँ होतीं और फिर यही सिलसिला....मैं कुछ नौ-दस साल की हूँगी जब मंझले चाचा की जिद पर मेरे पापा और दोनों चाचा के बीच बँटवारा हुआ था तब दादी को कितना दुख हुआ था मैं खुद इसकी साक्षी हूँ, दादी अपनी हमराज, हमदर्द मान अपनी किसी सखी के घर जातीं तो मैं भी उनके साथ होती थी, वो उनसे घर की तनावपूर्ण स्थिति के बारे में बातें करते-करते रो पड़ती थीं भले ही दादी की बातें उस समय मेरी समझ से परे थीं परंतु उनकी आँखों से बहते आँसू मुझे भी रुला देते थे, मैं दादी की बाँह पकड़े उनसे ऐसे चिपक कर बैठ जाती मानो मुझे भय हो कि दादी मुझे छोड़कर कहीं चली न जाएँ...मुझे रोती देख सभी यही कहते कि पूरे घर में सिर्फ इसे ही तुम्हारी चिंता है, और आज...मेरी दादी सच में सदा के लिए मुझे छोड़ गईं....छोड़ तो वो मुझे दो महीने पहले ही गईं थी पर उनकी उँगलियों के कोमल स्पर्श का अहसास आज दो महीने बाद मुझसे दूर हुआ.....
गाँव पहुँचने पर लोटे के जल से नजर उतार कर स्वागत करने की परंपरा तो अबसे सालों पहले समाप्त हो चुकी है पर अब तो स्वागत करती हुई वो नजरें भी नहीं रहीं जिनमें मेरे लिए आशीर्वाद और हमेशा कुछ नया बनवाकर खिलाने की इच्छा नजर आती....

साभार....मालती मिश्रा